“प्राचीन चिकित्सा ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ना होगा”: उपराष्ट्रपति धनखड़
उपराष्ट्रपति ने प्राचीन ग्रंथों के साक्ष्य-आधारित सत्यापन, डिजिटलीकरण और अनुवाद पर दिया जोर, वैकल्पिक चिकित्सा पर केंद्रित रहने का आह्वान
समग्र समाचार सेवा
पणजी, 22 मई : उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने आज राजभवन, गोवा में एक कार्यक्रम के दौरान प्राचीन ग्रंथों के साक्ष्य-आधारित सत्यापन, डिजिटलीकरण, अनुवाद और अंतर-विषयक अध्ययन पर जोर देते हुए वैकल्पिक चिकित्सा पर विशेष ध्यान देने की बात कही। उन्होंने कहा कि भारत वैकल्पिक चिकित्सा का जन्मस्थल है और इसे आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों से जोड़कर व्यापक रूप से फैलाने की जरूरत है।
उपराष्ट्रपति ने कहा, “हम एक ऐसे राष्ट्र हैं जो अपनी जड़ों को फिर से खोज रहा है और गहराई से उनमें जड़ें जमाएगा। प्राचीन ग्रंथ केवल पुस्तकालय की अलमारी के लिए नहीं हैं, बल्कि इन्हें व्यापक रूप से प्रचारित किया जाना चाहिए। आधुनिक शोध, नवाचार और पुनर्व्याख्या के जरिए इन शाश्वत विचारों को जीवंत करना होगा।”
उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा गुजरात के जामनगर में स्थापित वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र की भी सराहना की और इसे हमारी चिकित्सा प्रणालियों की सार्वभौमिक प्रासंगिकता का प्रतीक बताया।
उपराष्ट्रपति ने कहा, “अब समय आ गया है कि हम अपने वेदों, उपनिषदों, पुराणों और इतिहास में झांकें और बच्चों को जन्म से ही हमारी सभ्यता के गहन ज्ञान से अवगत कराएं।”
इस अवसर पर उन्होंने ‘चरक – आयुर्वेद के जनक’ और ‘सुश्रुत – शल्य चिकित्सा के पिता’ की प्रतिमाओं का राजभवन, गोवा में अनावरण किया। उन्होंने चरक को कुषाण काल के शाही चिकित्सक बताया और चरक संहिता को आयुर्वेद का आधारभूत ग्रंथ बताया। साथ ही सुश्रुत के वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सर्जिकल उपकरणों और चिकित्सा क्षेत्र में उनके योगदान पर प्रकाश डाला।
धनखड़ ने कहा, “सुश्रुत धन्वंतरि के शिष्य थे, जिन्होंने न केवल शल्य चिकित्सा में महारत हासिल की, बल्कि रोगी की देखभाल, स्वच्छता और प्रशिक्षण पर भी गहरा जोर दिया।”
उपराष्ट्रपति ने यह भी स्पष्ट किया कि “भारत में कुछ वर्गों में यह गलत धारणा है कि कोई भी प्राचीन या भारतीय चीज पिछड़ी हुई है। यह सोच आधुनिक भारत में कहीं भी स्वीकार्य नहीं है। पश्चिम ने हमारे ज्ञान को पहचाना है, अब समय है कि हम भी इसे समझें और स्वीकार करें।”
उन्होंने कहा, “अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी भारत को उत्कृष्टता का केंद्र बताया है और यह निवेश के लिए एक सुनहरा अवसर है। पश्चिम हमसे बहुत पीछे है और वे हमसे सीख रहे हैं।”
उपराष्ट्रपति ने चरक, सुश्रुत, धन्वंतरि, जीवक जैसे महान आयुर्वेदाचार्यों के साथ-साथ गणितज्ञ आर्यभट्ट, बौधायन और खगोलशास्त्री वराहमिहिर का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की सभ्यता अद्वितीय है और हमें अपने प्राचीन ज्ञान पर गर्व करना चाहिए।
उन्होंने यह भी बताया कि प्राचीन भारत में 300 से अधिक शल्यक्रियाएं, प्लास्टिक सर्जरी, फ्रैक्चर मैनेजमेंट और यहां तक कि सीज़रियन डिलीवरी तक प्रचलित थीं।
उपराष्ट्रपति ने अंत में कहा, “सुश्रुत के ग्रंथ न केवल शारीरिक ज्ञान पर आधारित हैं, बल्कि उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सटीकता, प्रशिक्षण, स्वच्छता और रोगी देखभाल की गहरी समझ भी झलकती है।”
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