समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 29 जुलाई: कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने लोकसभा में ऑपरेशन सिंदूर पर चल रही महत्वपूर्ण चर्चा से अपने और शशि थरूर जैसी वरिष्ठ सदस्य को बाहर किए जाने पर तंज कसते हुए पार्टी की नाराजगी जाहिर की है। आनंदपुर साहिब से सांसद तिवारी ने सोशल मीडिया पोस्ट में उस समाचार लेख का स्क्रीनशॉट साझा किया, जिसमें यह बताया गया था कि उन्हें वक्ताओं की सूची से हटा दिया गया है। इस अवसर पर उन्होंने 1970 की फिल्म पूरब और पश्चिम के देशभक्ति गीत “है प्रीत जहाँ की रीत सदा” के पंक्तियों को भी उद्धृत किया, जो उनके कथन को गहन भावनात्मक आयाम देता है।
मीडिया से बातचीत में मनुष तिवारी ने कहा, “अंग्रेजी में एक कहावत है – ‘अगर आप मेरी खामोशी को नहीं समझते, तो आप मेरे शब्दों को कभी नहीं समझ पाएंगे।’” सूत्रों की मानें तो तिवारी इस बहस में शामिल होना चाहते थे और उन्होंने राहुल गांधी अध्यक्षता वाले विपक्षी दल के कार्यालय को पत्र भेजकर अपनी भागीदारी जताई थी, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें बहस में शामिल करने से मना कर दिया।
#WATCH | On his tweet, Congress MP Manish Tewari says, "There is a saying in English- 'If you don't understand my silences, you will never understand my words'. " pic.twitter.com/r1MsSt4wgZ
— ANI (@ANI) July 29, 2025
शशि थरूर की स्थिति पर बात करें, तो केरल के सांसद ने पार्टी से यह कहते हुए बहस में शामिल होने से इनकार कर दिया कि वे ऑपरेशन सिंदूर की आलोचना में पार्टी नीति का पालन नहीं कर पाएंगे। थरूर ने कहा कि जब भी वे विदेश दौरे पर जाते हैं, उनका मानना होता है कि यह ऑपरेशन सफल रहा और वे इस दृष्टिकोण से विचलित नहीं हो सकते। जब मीडिया ने उनसे पूछा कि क्या वे संसद में चर्चा करेंगे, तो थरूर ने गंभीरता से कहा कि वे इस विषय पर मौन व्रत के मूड में हैं।
इस पूरी घटना से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस अंदरूनी रणनीति और बहस की रूपरेखा को लेकर किसी स्तर पर असहजता में है। ऑपरेशन सिंदूर जैसे संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दों पर रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने के बावजूद, पार्टी अचानक भीतर से टूटती नजर आई है। जहां एक ओर मनीष तिवारी जैसी अनुभवी आवाज को बहस से बाहर रखा गया, वहीं थरूर ने खुद यह संकेत दिया कि वे इसमें शामिल नहीं होंगे।
इस पूरे विवाद ने कांग्रेस की स्पष्टता और भागीदारी की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोकतंत्र में बहस का महत्व सर्वोपरि होता है, विशेषकर उस मुद्दे पर जिसमें देश की सुरक्षा से जुड़ी बात चले। जनता जानना चाहती है कि पार्टी नेतृत्व किन मानदंडों के आधार पर वक्ताओं की सूची का निर्णय लेता है। यदि भीतर से सांसदों में विचार विभेद है, तो उसे सार्वजनिक रूप से रेखांकित करने के बजाय खामोशी अपनाना कितना उपयुक्त है?
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