समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 31 जुलाई: पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पवन चिदंबरम ने अमेरिका की ओर से भारत पर लगाए गए 25% टैरिफ और रूसी तेल खरीद पर दंडात्मक जुर्माने को भारतीय व्यापार के लिए बड़ा झटका बताया है। साथ ही उन्होंने इसे विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों का स्पष्ट उल्लंघन करार दिया।
चिदंबरम ने X (पूर्व ट्विटर) पर लिखा:
“अमेरिका द्वारा भारत से आयातित सभी वस्तुओं पर 25% टैरिफ और रूसी तेल खरीदने पर penalty—यह भारत-अमेरिका व्यापार को एक बड़ा झटका है। दोस्ती कूटनीति और गहन वार्ता का विकल्प नहीं हो सकती। अमेरिका द्वारा लगाया गया यह टैरिफ WTO नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है।”
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वाशिंगटन दौरे के दौरान दिए गए बयान पर भी सवाल उठाया:
“MIGA + MAGA = MEGA क्या हुआ?”, उन्होंने पूछा।
यहाँ MODI का “Make India Great Again” (MIGA) और अमेरिकी “Make America Great Again” (MAGA) को जोड़कर बनाई गई MEGA साझेदारी की बात की जा रही थी।
The 25 per cent tariff on all Indian exports to the United States PLUS penalty for buying Russian oil is a big blow to India's trade with the U.S.
'Dosti' is no substitute for diplomacy and painstaking negotiations
The tariff imposed by the U.S. is a clear violation of the WTO…
— P. Chidambaram (@PChidambaram_IN) July 31, 2025
ट्रंप का बयान: दोस्ती, लेकिन व्यापार से दूरी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी Truth Social पोस्ट में यह घोषणा की थी कि 1 अगस्त से भारत पर 25% टैरिफ लागू होगा। उन्होंने भारत को ऐसे देश के रूप में वर्णित किया जिसने दुनियाभर में शीर्ष स्तर के टैरिफ लगाए हुए हैं और मजबूत गैर-आर्थिक व्यापार बाधाएँ खड़ी की हैं। साथ ही रूस से ऊर्जा खरीदने के लिए अतिरिक्त दंड की भी घोषणा की।
चिदंबरम की आलोचना: कूटनीति और अहंकार की खामी
चिदंबरम ने न सिर्फ उस टैरिफ पर सवाल खड़ा किया, बल्कि मोदी सरकार को विदेश नीति की कमजोरियाँ भी दिखाईं:
- उन्होंने लिखा कि दोस्ती की पॉलिसी से मुद्दों का हल नहीं होता; कूटनीति और बातचीत आवश्यक है।
- आमूलचूल सुधार और व्यापार समझौतों में सटीक रणनीति की आवश्यकता है।
- उन्होंने मोदी के MAGA-MIGA-MEGA फॉर्मूले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि इसका मकसद राजनीतिक संदेश था न कि ठोस नीति।
आर्थिक असर और WTO का पक्ष
चिदंबरम ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय भारत के लिए निर्यातियों अथवा अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक होगा। साथ ही यह भी कहा कि WTO नियमों के अनुसार यूरोपीय संघ और अन्य देशों को अनिवार्य रूप से मुआवजा देने का अधिकार है।
विशेषज्ञों के अनुसार:
- कपास, इंजीनियरिंग, फार्मास्युटिकल्स, सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और ऑटोमोबाइल जैसे क्लस्टर प्रभावित होंगे।
- भारत को वैकल्पिक बाजारों जैसे यूरो, जापान, ASEAN समूह की ओर रुख करना पड़ सकता है।
राजनीतिक विमर्श का स्वरूप
चिदंबरम के बयान ने घरेलू राजनीतिक पटल पर भी हलचल पैदा कर दी है:
- कांग्रेस ने सरकार की निष्क्रियता और नरम प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए हैं।
- भाजपा की विदेश नीति रणनीति को विश्वासयोग्य रखने की चुनौती सामने आई है।
- विपक्ष ने इस मुद्दे को आर्थिक सुरक्षा और राष्ट्रीय गौरव के संदर्भ में पेश कर दिया है।
दोस्ती से ज्यादा कूटनीति की जरूरत
चिदंबरम का आरोप है कि मोदी सरकार ने संबंधों और टैरिफ लचीलेपन में गरीब रणनीति अपनाकर भारत के आर्थिक हितों को जोखिम में डाला है। अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकार जनहित में ठोस वार्ता और नीति निर्माण द्वारा इस संकट का सामना कर सकती है?
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में तनिक संतुलन खोने की कीमत, कूटनीति की मजबूत समझ, रणनीतिक ପ्रतिक्रिया और WTO अधिकारों का संरक्षण ही चुका सकती है।
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