समग्र समाचार सेवा
पुणे, 17 अगस्त: राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के अध्यक्ष शरद पवार ने शनिवार को एक कार्यक्रम में अपने राजनीतिक सफर का बड़ा खुलासा किया। उन्होंने कहा कि 1978 में उन्होंने वसंतदादा पाटिल की महाराष्ट्र सरकार गिराने में अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन एक दशक बाद मुख्यमंत्री पद के लिए खुद वसंतदादा ने ही उनका नाम आगे बढ़ाया। पवार ने इसे कांग्रेस नेतृत्व की “उदारता और दूरदर्शिता” का उदाहरण बताया।
पुरानी यादों में शरद पवार
84 वर्षीय राज्यसभा सांसद और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पवार ने कहा कि आपातकाल के बाद कांग्रेस दो हिस्सों में बंट गई थी—कांग्रेस (इंदिरा) और स्वर्ण सिंह कांग्रेस। उस समय वह अपने गुरु यशवंतराव चव्हाण के साथ स्वर्ण सिंह कांग्रेस में रहे। चुनाव के बाद किसी भी पक्ष को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और वसंतदादा पाटिल को मुख्यमंत्री बनाया गया।
पवार ने कहा, “हममें से कई युवा कार्यकर्ता कांग्रेस (आई) के खिलाफ थे क्योंकि हम चव्हाण साहब के साथ जुड़े थे। इसलिए दूरी बनी रही। मैंने और कुछ साथियों ने इसका विरोध किया और सरकार गिराने का फैसला किया। अंततः मैं खुद मुख्यमंत्री बना।”
‘जिस नेता की सरकार गिराई, उसी ने आगे बढ़ाया मेरा नाम’
शरद पवार ने कहा कि दस साल बाद हालात बदले और कांग्रेस एकजुट हुई। जब नए मुख्यमंत्री के नाम पर चर्चा हुई तो कई नाम सामने आए—रामराव आदिक, शिवाजीराव निलंगेकर सहित अन्य। लेकिन उसी समय वसंतदादा पाटिल ने बैठक में कहा कि और चर्चा की जरूरत नहीं है।
पवार ने याद किया, “वसंतदादा ने कहा कि हमें पार्टी का पुनर्निर्माण करना है और शरद इसका नेतृत्व करेंगे। सोचिए, जिस नेता की सरकार मैंने गिराई, उन्होंने व्यक्तिगत मतभेदों को दरकिनार कर मुझे मुख्यमंत्री पद के लिए आगे किया। यही कांग्रेस का उदार नेतृत्व था।”
एनसीपी और पवार की राजनीतिक राह
शरद पवार ने 1999 में कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की स्थापना की। जुलाई 2023 में उनके भतीजे अजित पवार ने तत्कालीन शिवसेना-भाजपा गठबंधन सरकार में शामिल होकर एनसीपी को दो हिस्सों में बांट दिया। इस घटनाक्रम के बाद शरद पवार की राजनीतिक पकड़ को चुनौती मिली, लेकिन वह अब भी अपनी राजनीतिक सोच और अनुभव से चर्चा में बने रहते हैं।
कांग्रेस की उदार परंपरा पर जोर
पवार ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि कांग्रेस में उस दौर में विचारधारा को महत्व देने वाला और व्यक्तिगत मतभेदों को दरकिनार करने वाला नेतृत्व मौजूद था। उन्होंने कहा, “कांग्रेस के भीतर ऐसा ही माहौल था जिसने युवा नेताओं को अवसर दिया और एकता बनाए रखी। आज की राजनीति में इस तरह का दृष्टिकोण बहुत कम देखने को मिलता है।”
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