बिहार चुनाव 2025: मतदाता सूची में गड़बड़ी से हड़कंप, 3 लाख वोटर पर संकट, सीमा जिलों पर सबसे बड़ा असर

समग्र समाचार सेवा
पटना, 29 अगस्त: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले मतदाता सूची को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) प्रक्रिया के तहत अब तक करीब 3 लाख मतदाताओं के दस्तावेज़ों में गड़बड़ियां सामने आई हैं। चुनाव आयोग के निर्देश पर निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (EROs) ने इन मतदाताओं को 7 दिन के भीतर नागरिकता साबित करने का नोटिस भेजना शुरू कर दिया है।

अधिकारियों का कहना है कि यह संख्या और भी बढ़ सकती है, क्योंकि कई विधानसभा क्षेत्रों में जांच अभी पूरी नहीं हुई है। सबसे अधिक नोटिस उन जिलों में भेजे गए हैं, जो नेपाल और पश्चिम बंगाल की सीमा से लगे हैं—जैसे किशनगंज, पूर्णिया, पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, अररिया, सहरसा, सुपौल और मधुबनी। इन क्षेत्रों में नागरिकता और मतदाता सूची से जुड़े विवाद पहले भी बार-बार उठते रहे हैं।

कितने लोग शामिल हुए और कितनों के नाम हटे?

1 अगस्त को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में कुल 7.24 करोड़ मतदाता शामिल थे। चुनाव आयोग के मुताबिक अब तक 98.2% मतदाताओं ने दस्तावेज जमा कर दिए हैं, जबकि 65 लाख नाम पहले ही ड्राफ्ट सूची से हटा दिए गए। इनमें मृतक, स्थानांतरित, एक से अधिक जगह पंजीकृत और अनुपलब्ध मतदाता शामिल हैं।

अधिकारियों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति का नाम सुनवाई और आदेश के बिना सूची से नहीं हटाया जाएगा। संदिग्ध नागरिकता की जानकारी बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) और अन्य प्रवर्तन एजेंसियों से मिली है।

किन्हें नोटिस भेजा जा रहा है?

नोटिस उन्हीं को भेजे जा रहे हैं:

  • जिन्होंने दस्तावेज़ जमा नहीं किए।
  • जिनके कागजात अधूरे या गलत पाए गए।
  • जिनकी नागरिकता और पात्रता संदिग्ध है।

नोटिस में साफ लिखा गया है कि दस्तावेज़ों में विसंगतियां पाई गई हैं, इसलिए तय समय पर मूल प्रमाणपत्र लेकर उपस्थित होना अनिवार्य है।

नागरिकता साबित करने के नए नियम क्यों?

चुनाव आयोग ने 2003 के बाद पंजीकृत सभी मतदाताओं से नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज़ मांगे हैं। विशेष रूप से 1 जुलाई 1987 के बाद जन्मे मतदाताओं को अपने जन्म प्रमाणपत्र और माता-पिता के जन्म स्थान/तारीख का सबूत देना होगा।

आयोग का कहना है कि यह कदम मतदाता सूची की शुद्धता और फर्जी पंजीकरण रोकने के लिए आवश्यक है। हालांकि इस आदेश को कई राजनीतिक दलों ने चुनौती दी है और मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है।

राजनीतिक घमासान तेज

सीमा जिलों में भेजे गए नोटिस को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस और राजद का आरोप है कि यह कार्रवाई चुनावी गणित बदलने के लिए की जा रही है। वहीं, बीजेपी और जेडीयू का कहना है कि यह प्रक्रिया लोकतंत्र की मजबूती और चुनावी पारदर्शिता के लिए जरूरी है।

निष्कर्ष / ओपिनियन

मतदाता सूची में गड़बड़ी और नागरिकता साबित करने के नए नियम ने बिहार चुनाव 2025 से पहले बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। जहां चुनाव आयोग इसे लोकतंत्र को पारदर्शी बनाने की प्रक्रिया बता रहा है, वहीं विपक्ष इसे लक्षित कार्रवाई मान रहा है।
आने वाले हफ्तों में सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की भूमिका तय करेगी कि यह विवाद बिहार की राजनीति में नया भूचाल लाएगा या सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया साबित होगी।

 

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