मोहन भागवत बोले: अखंड भारत जनमानस की एकता का प्रतीक, संघ किसी का विरोधी नहीं

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 29 अगस्त: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला “100 वर्ष की संघ यात्रा- नए क्षितिज” का समापन संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत के संबोधन के साथ हुआ। इस अवसर पर उन्होंने कई अहम मुद्दों पर विचार साझा किए, जिनमें अखंड भारत, सामाजिक एकता, मतांतरण, जनसंख्या संतुलन और महिलाओं की भागीदारी जैसे विषय प्रमुख रहे।

अखंड भारत: जनमानस की एकता का प्रतीक

डॉ. भागवत ने कहा कि “भारत एक अखंड राष्ट्र है, जो जीवन का सत्य है। हमारे पूर्वज, संस्कृति और मातृभूमि हमें जोड़ते हैं। अखंड भारत केवल राजनीति नहीं, बल्कि जनमानस की एकता का प्रतीक है।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ किसी का विरोधी नहीं है। पूजा-पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं, लेकिन हमारी पहचान एक है। मुसलमानों को यह डर छोड़ना होगा कि साथ चलने से उनका इस्लाम समाप्त हो जाएगा।

संघ की कार्य पद्धति और सामाजिक भूमिका

भागवत ने कहा कि संघ किसी संगठन का अधीनस्थ नहीं है, बल्कि सभी संस्थाएँ स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि “संघ कभी अपने झंडे के साथ अलग नहीं होता, स्वयंसेवकों को अच्छे कार्यों में सहयोग की स्वतंत्रता है।”
उन्होंने यह भी कहा कि संगठन और दल के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं।

रोजगार और आत्मनिर्भरता

अपने भाषण में भागवत ने कहा, “हमें नौकरी मांगने वाले नहीं, नौकरी देने वाले बनना है। आजीविका का भ्रम समाप्त करना होगा।” उन्होंने युवाओं से उद्यमिता अपनाने और समाज को आत्मनिर्भर बनाने का आह्वान किया।

जनसंख्या संतुलन और मतांतरण

संघ प्रमुख ने जनसंख्या नियंत्रण पर जोर देते हुए कहा कि संतुलित जन्म दर आवश्यक है। उन्होंने चेतावनी दी कि “जनसंख्यात्मक परिवर्तन से गंभीर परिणाम हो सकते हैं, यहां तक कि देश का विभाजन भी।”
उन्होंने मतांतरण और अवैध घुसपैठ को इस समस्या का कारण बताया और विदेशों से आने वाले फंड पर कड़ा नियंत्रण की आवश्यकता जताई।

हिंदू-मुस्लिम एकता और आरक्षण

भागवत ने कहा कि हिंदू और मुसलमान दोनों के पूर्वज और संस्कृति समान हैं। संघ पर यह आरोप गलत है कि वह किसी का विरोध करता है।
आरक्षण के विषय पर उन्होंने कहा कि “यह संवेदना का विषय है। अन्याय का परिमार्जन होना चाहिए और संविधान सम्मत आरक्षण का समर्थन होना चाहिए।”

महिलाओं और मंदिरों की भूमिका

महिलाओं की भागीदारी पर उन्होंने कहा कि संघ प्रेरित कई संगठनों का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं। उन्होंने समाज संगठन में महिला सशक्तिकरण को आवश्यक बताया।
मंदिरों पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि सभी मंदिर सरकार के पास नहीं हैं, कुछ निजी और ट्रस्ट के पास हैं। उनकी स्थिति अच्छी रहनी चाहिए।

भाषा और संवाद

भागवत ने कहा कि भारत की सभी भाषाएँ राष्ट्रीय हैं, लेकिन संवाद के लिए एक व्यवहार भाषा आवश्यक है। उन्होंने संघ को “परिवर्तनशील संगठन” बताया, जो समय के साथ बदलता है, लेकिन अपने मूल सिद्धांतों पर अडिग रहता है।

संघ प्रमुख का यह संबोधन स्पष्ट करता है कि आरएसएस केवल राजनीति तक सीमित संगठन नहीं है, बल्कि समाज, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण का व्यापक दृष्टिकोण रखता है।
अखंड भारत, सामाजिक एकता, आत्मनिर्भरता और आरक्षण जैसे मुद्दों पर उनकी बातें आने वाले समय में राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को प्रभावित कर सकती हैं।

 

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