आज़म खान की रिहाई के बाद यूपी की राजनीति में सियासी बवंडर, सपा के भविष्य पर उठे सवाल

समग्र समाचार सेवा
लखनऊ, 26 सितंबर: उत्तर प्रदेश के प्रमुख सपा नेता आज़म खान की लगभग दो साल बाद जेल से रिहाई के बाद राज्य की राजनीति में सियासी हलचल बढ़ गई है। मुस्लिम वोटों पर जबरदस्त प्रभाव रखने वाले आज़म खान का राजनीतिक करियर अब कई विवादों और मुकदमों के कारण चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है।

आज़म खान की रिहाई के 12 दिन बाद, 8 अक्टूबर को उनकी मुलाकात समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव से होने वाली है। इस मुलाकात को लेकर राजनीतिक विश्लेषक अनुमान लगा रहे हैं कि यह कदम सपा के भीतर आज़म खान की भूमिका और मुस्लिम मतदाताओं को जोड़े रखने के प्रयास से जुड़ा है। खासतौर पर यह मुलाकात बसपा प्रमुख मायावती की 9 अक्टूबर की रैली से पहले की जा रही है, ताकि आज़म खान का झुकाव किसी अन्य दल की ओर न हो।

सपा के भीतर आज़म खान की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही। संपत्ति हड़पने, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते उनका राजनीतिक प्रभाव कमजोर हुआ है। उनके खिलाफ 100 से ज़्यादा आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें उन्हें 2023 और 2024 में जेल की सजा सुनाई गई। इन सजाओं के कारण वे छह साल के लिए चुनाव लड़ने के योग्य नहीं हैं। इसके अलावा, लंबी जेल की सज़ा और स्वास्थ्य समस्याओं ने उनकी सक्रिय राजनीतिक भागीदारी पर गंभीर असर डाला है।

हालाँकि, आज़म खान की अनुपस्थिति के बावजूद समाजवादी पार्टी ने रामपुर और मुरादाबाद में जीत हासिल की है। 2022 के रामपुर उपचुनाव में सपा के प्रतिद्वंदी मोहिबुल्लाह को टिकट दिया गया और उन्होंने जीत दर्ज की। इसका मतलब है कि पार्टी आज़म खान के बिना भी मजबूत बनी हुई है।

अखिलेश यादव ने मुस्लिम वोटों के एकीकरण और सपा की स्थिति मजबूत करने के लिए आज़म खान से मिलने का निर्णय लिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मुलाकात पार्टी के भीतर मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को बनाए रखने और किसी संभावित गठबंधन को रोकने के प्रयास के रूप में देखी जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषक यह भी बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट अब किसी एक नेता का एकाधिकार नहीं है। एआईएमआईएम और अन्य पार्टियों के कमजोर प्रदर्शन ने मुस्लिम मतदाताओं को सपा और कांग्रेस की ओर अधिक आकर्षित किया है। ऐसे में आज़म खान की सिफारिशें केवल कुछ स्थानीय प्रभाव ही रख सकती हैं।

स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और लंबी जेल की सज़ा के कारण 77 वर्षीय आज़म खान अब बड़े चुनावी अभियान में सक्रिय नहीं हो सकते। इससे मुस्लिम और यादव मतदाताओं को एकजुट करने की उनकी क्षमता सीमित हो गई है। फिर भी उनकी रिहाई ने राज्य की राजनीतिक रणनीतियों और आगामी चुनावों में सपा की चाल को प्रभावित किया है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज़म खान की वापसी संकेत देती है कि उनके प्रभाव में कमी आई है, लेकिन उनकी उपस्थिति अभी भी मुस्लिम मतदाताओं और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

 

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