मोहन भागवत का परिवार: संघ की शताब्दी यात्रा में समर्पण और विरासत की प्रेरक कहानी

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 30 सितंबर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत का परिवार संघ की शताब्दी यात्रा में एक अनूठी पहचान रखता है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के कठिन मिशन से लेकर नरेंद्र मोदी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे प्रमुख नेताओं को मार्गदर्शन देने तक, भागवत परिवार ने अपनी कई पीढ़ियों को संघ और समाज की सेवा के लिए समर्पित किया।

नाना साहेब भागवत: हेडगेवार के सच्चे सहयोगी

मोहन भागवत के दादा श्रीनारायण पांडुरंग भागवत (नाना साहेब) का जन्म 1884 में चंद्रपुर जिले के वीरमल गाँव में हुआ। आर्थिक तंगी के बावजूद उन्होंने प्रयागराज से कानून की डिग्री ली और वकील बने।

कांग्रेस से जुड़े रहते हुए जब वे डॉ. हेडगेवार के संपर्क में आए, तो उन्होंने बिना संकोच उनके नेतृत्व को स्वीकार कर लिया। नाना साहेब ने न केवल अपने घर को आरएसएस कार्यकर्ताओं के लिए खोल दिया, बल्कि बच्चों के प्रति उनके स्नेह और सादगी ने अनगिनत प्रचारकों को प्रेरित किया। यही प्रभाव आगे चलकर उनके पुत्र मधुकर राव पर भी पड़ा।

मधुकर राव भागवत: गुजरात में संघ की नींव रखने वाले

मोहन भागवत के पिता मधुकर राव भागवत को 1941 में प्रचारक बनाकर गुजरात भेजा गया। वहीं से उन्होंने आरएसएस की मजबूत नींव रखी। 1941 से 1948 के बीच उन्होंने गुजरात के 115 शहरों और कस्बों में संघ की शाखाएँ स्थापित कीं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पुस्तक ज्योतिपुंज में विस्तार से लिखा है कि कैसे मधुकर राव से उनकी मुलाकात ने उनके जीवन की दिशा तय की। लालकृष्ण आडवाणी के राजनीतिक जीवन पर भी मधुकर राव का गहरा प्रभाव रहा।

परिवार का योगदान और प्रेरणा

नाना साहेब और मधुकर राव की समर्पित जीवन यात्रा का प्रभाव परिवार पर भी पड़ा। मोहन भागवत को बचपन से ही संघ संस्कार मिले। यही कारण है कि आज वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शीर्ष पर विराजमान हैं और संघ की विचारधारा को नए युग में आगे बढ़ा रहे हैं।

भागवत परिवार की यह कहानी न केवल संघ की परंपरा का हिस्सा है, बल्कि यह दर्शाती है कि कैसे एक परिवार की तीन पीढ़ियाँ समाज और संगठन की सेवा में निरंतर लगी रहीं।

संघ की 100 साल की यात्रा में भागवत परिवार का योगदान प्रेरणादायी है। नाना साहेब के संघर्ष, मधुकर राव की संगठनात्मक क्षमता और मोहन भागवत का नेतृत्व इस बात का प्रमाण है कि परिवार की विरासत ने संघ को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उस समर्पण की है जो संघ को जन-जन तक पहुँचाने का आधार बनी।

 

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