सोमनाथ स्वाभिमान पर्व : पीएम मोदी ने सांस्कृतिक अटूटता और संघर्ष की गाथा को किया स्मरण

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का शुभारंभ, प्रधानमंत्री ने राष्ट्र की एकता पर दिया जोर

  • प्रधानमंत्री ने ‘एक्स’ पर साझा किया संदेश, सोमनाथ की ऐतिहासिक यात्रा को किया याद
  • 1026 के आक्रमण से लेकर पुनर्निर्माण तक की गाथा का किया उल्लेख
  • नागरिकों से ‘#सोमनाथ_स्वाभिमान_पर्व’ के साथ तस्वीरें साझा करने की अपील
  • 1951 के पुनर्निर्माण और 2001 के स्वर्ण जयंती समारोह का किया स्मरण

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली|08 जनवरी: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार से शुरू हो रहे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर भारत की सांस्कृतिक अटूटता और संघर्ष की दीर्घ परंपरा को स्मरण किया। उन्होंने कहा कि अटूट आस्था के एक हजार वर्ष का यह अवसर राष्ट्र की एकता और सांस्कृतिक चेतना के लिए निरंतर प्रयासरत रहने की प्रेरणा देता है।

एक हजार साल की अडिग आस्था

प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा कि जनवरी 1026 में सोमनाथ मंदिर ने अपने इतिहास का पहला आक्रमण झेला था, लेकिन उसके बाद हुए अनेक हमले भी भारत की शाश्वत आस्था को डिगा नहीं सके। उन्होंने कहा कि इन संघर्षों ने देश की सांस्कृतिक एकता को और अधिक सशक्त किया तथा सोमनाथ का बार-बार पुनरोद्धार होता रहा।

नागरिकों से विशेष अपील

पीएम मोदी ने सोमनाथ की अपनी पिछली यात्राओं की तस्वीरें साझा करते हुए देशवासियों से अपील की कि यदि वे भी सोमनाथ गए हैं, तो अपनी स्मृतियों और तस्वीरों को ‘हैशटैग सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के साथ साझा करें।

महान विभूतियों का योगदान स्मरण

प्रधानमंत्री ने 31 अक्टूबर 2001 को सोमनाथ में आयोजित कार्यक्रम की झलकियां भी साझा कीं। उन्होंने बताया कि यह अवसर 1951 में पुनर्निर्मित मंदिर के उद्घाटन के 50 वर्ष पूर्ण होने का था, जो तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में संपन्न हुआ था।

उन्होंने कहा कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में सरदार पटेल और के.एम. मुंशी सहित कई महान विभूतियों का योगदान अत्यंत उल्लेखनीय रहा। वर्ष 2001 के कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी सहित अनेक प्रमुख लोग शामिल हुए थे।

2026 की ओर दृष्टि

प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्ष 2026 में 1951 के उस ऐतिहासिक समारोह के 75 वर्ष पूर्ण होने का भी स्मरण किया जाएगा, जो भारत की सांस्कृतिक चेतना और पुनर्निर्माण के संकल्प का प्रतीक है।

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