भारत की परंपरा ज्ञान की परंपरा है-दत्तात्रेय होसबाले

ज्ञान के साथ भक्ति आवश्यक, अन्यथा अहंकार का जन्म — होसबाले

  • भारत की ज्ञान परंपरा से ही यश और वैभव की प्राप्ति-दत्तात्रेय होसबाले
  • ज्ञान के साथ भक्ति आवश्यक, अन्यथा अहंकार का जन्म-होसबाले
  • ‘मंत्र-विप्लव’ वैचारिक विकृति और भ्रम के विरुद्ध प्रतिकार-सुधांशु त्रिवेदी
  • भारतीय ज्ञान परंपरा के शब्दों पर गहन अध्ययन की आवश्यकता

 

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली | 16 जनवरी: भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा पर केंद्रित पुस्तक ‘मंत्र-विप्लव’ का लोकार्पण गुरुवार को भारत मंडपम में चल रहे विश्व पुस्तक मेले के दौरान हुआ। इस अवसर पर दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि भारत की परंपरा मूलतः ज्ञान की परंपरा है, जिससे राष्ट्र को यश और वैभव की प्राप्ति हुई है।

ज्ञान, भक्ति और अहंकार


कार्यक्रम को संबोधित करते हुए होसबाले ने कहा कि ज्ञान व्यक्ति को सही दिशा में ले जाता है, किंतु भक्ति के अभाव में वही ज्ञान अहंकार को जन्म देता है। उन्होंने स्मरण कराया कि हमारे पूर्वजों को ज्ञान की भूमिका और दिशा का स्पष्ट बोध था।

महर्षि अरविन्दो के तीन सूत्र

होसबाले ने महर्षि अरविन्दो के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्र भारत के लिए तीन कार्य अनिवार्य हैं—

  • पहला, विखरी हुई प्राचीन ज्ञान परंपरा का एकत्रीकरण
  • दूसरा, उसे समकालीन जीवन और मानव-हित के अनुकूल बनाना
  • तीसरा, नए ज्ञान का सृजन।

उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े शब्दों पर अभी व्यापक अध्ययन शेष है।

विकृत विमर्श और ‘मंत्र-विप्लव’

गलत विमर्श गढ़े जाने के प्रयासों पर होसबाले ने कहा कि सत्य और इतिहास को विकृत करने के प्रयास अज्ञान से नहीं, बल्कि सुनियोजित एजेंडे से हुए हैं। इससे समाज में संभ्रम की स्थिति बनी और जैसे-जैसे बाहरी प्रभाव मन-बुद्धि पर हावी हुए, ‘मंत्र-विप्लव’ की परिस्थिति पैदा हुई। उन्होंने चेताया कि सम्मोह से बुद्धि का नाश और बुद्धि के नाश से सर्वनाश होता है।

दृश्य और अदृश्य चुनौतियाँ

इस अवसर पर राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि समाज के बौद्धिक प्रतिष्ठान का एक वर्ग ‘एम-फैक्टर’ (मैकाले, मुगल और मार्क्स) से प्रभावित रहा है। उन्होंने दो प्रकार की चुनौतियों का उल्लेख किया जो दिखाई देती हैं और जो संक्रमण की तरह अदृश्य रहती हैं। उनके अनुसार, ‘मंत्र-विप्लव’ अदृश्य चुनौतियों को रेखांकित कर उनसे निपटने का मार्ग दिखाती है।

पुस्तक का  उद्देश्य

पुस्तक के लेखक तरुण विजय ने बताया कि ‘मंत्र-विप्लव’ विचारों की भ्रष्टता से उत्पन्न राष्ट्रीय संकटों का बौद्धिक प्रतिकार प्रस्तुत करती है। उन्होंने महात्मा विदुर के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जब विचार ही भ्रष्ट हो जाएँ और राजा-प्रजा में भ्रम उत्पन्न हो, तब राष्ट्र के समग्र नाश का संकट खड़ा होता है, पुस्तक उसी स्थिति को रोकने का जतन है।

कार्यक्रम में पुस्तक के प्रकाशक प्रभात प्रकाशन के चेयरमैन प्रभात कुमार भी उपस्थित रहे।

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