- मद्रास हाईकोर्ट ने नदियों को प्रदूषित करने पर कड़ी टिप्पणी की।
- अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता भी जनस्वास्थ्य के अधीन।
- तमिराबरानी नदी में श्राद्ध के दौरान कपड़े-जैसी सामग्री डाले जाने पर चिंता।
- अदालत ने जिला प्रशासन को प्रदूषण रोकने के व्यावहारिक सुझाव देने का निर्देश दिया।
समग्र समाचार सेवा
चेन्नई 13 जुलाई : मद्रास हाईकोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट किया कि धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर किसी भी व्यक्ति को जल स्रोतों को प्रदूषित करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता भी जनस्वास्थ्य और पर्यावरण के अधीन है, और धार्मिक अधिकारों का प्रयोग पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस बी. पुगालेंधी की खंडपीठ ने यह टिप्पणी तमिराबरानी नदी में श्राद्ध कर्म के दौरान बड़ी मात्रा में कपड़े और अन्य सामग्री फेंके जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए की। अदालत को बताया गया कि नदी में प्रतिदिन एक टन से अधिक कपड़े फेंके जा रहे हैं, जिससे ई-कोलाई बैक्टीरिया के पनपने का खतरा बढ़ गया है। साथ ही, नदी में फेंके गए कांच के फोटो फ्रेम और कपड़ों में फंसे कछुए जलजीवों के लिए भी खतरा बन रहे हैं।
अदालत ने कहा कि तमिलनाडु पब्लिक हेल्थ एक्ट, 1939 और वाटर (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) एक्ट, 1974 जल स्रोतों को प्रदूषित करने पर रोक लगाते हैं। हालांकि, कोर्ट ने इस प्रथा को अंधविश्वास नहीं बताया और कहा कि मामला धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है, इसलिए सभी पक्षों को सुने बिना अंतिम आदेश जारी नहीं किया जाएगा।
कोर्ट ने तिरुनेलवेली जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि लोगों को जागरूक करने और नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए व्यावहारिक सुझाव पेश करे।
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