कर्नाटक : भीमव्वा को 2025 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया
96 वर्षीय भीमव्वा शिल्लेक्याथारा को भारत की पारंपरिक छाया कठपुतली कला 'टोगळु गोंबेआटा' को 70 वर्षों तक जीवित रखने के लिए पद्मश्री मिला।
- कर्नाटक के कोप्पल जिले की मूल निवासी, भीमव्वा ने इस कला को अपने परिवार से सीखा और जीवन भर इसे सहेजा।
- टोगळु गोंबेआटा: चमड़े की कठपुतलियों से पर्दे के पीछे से कहानियाँ सुनाने की प्राचीन परंपरा, रामायण-महाभारत जैसे महाकाव्यों की प्रस्तुति।
- समय के साथ इस कला को संरक्षित और अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए भीमव्वा ने लगातार प्रयास किए।
- 2025 में पद्मश्री के साथ राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित; पीएम मोदी ने भी उन्हें नमन किया, जो सांस्कृतिक धरोहर की मान्यता का प्रतीक बना।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 10 अगस्त :भारत की छाया कठपुतली परंपरा ‘टोगळु गोंबेआटा’ को 96 वर्षीय भीमव्वा डोड्डबालप्पा शिल्लेक्याथारा ने सात दशकों तक जीवित रखा।
कर्नाटक के कोप्पल जिले से ताल्लुक रखने वाली भीमव्वा को 2025 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यह पारंपरिक कला चमड़े की कठपुतलियों के जरिए पर्दे के पीछे से भारतीय महाकाव्यों और लोककथाओं का मंचन करती है। भीमव्वा ने न केवल प्रदर्शन जारी रखा, बल्कि युवाओं को भी इस कला में प्रशिक्षित किया, जिससे यह परंपरा आज भी जीवित है। उनकी कहानी इस बात का प्रतीक है कि संस्कृति केवल किताबों में नहीं, बल्कि साधकों की निःस्वार्थ साधना में जीवित रहती है। पद्मश्री सम्मान से भीमव्वा और इस अद्भुत परंपरा दोनों को राष्ट्रीय पहचान मिली है।
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