अब सिर्फ एक साल की वकालत से बन सकेंगे सिविल जज

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: अब सिर्फ एक साल की वकालत से बन सकेंगे सिविल जज

  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला के तहत सिविल जज परीक्षा के लिए वकालत का अनिवार्य अनुभव 3 साल से घटाकर 1 साल कर दिया गया है।
  • यह नया नियम 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली न्यायिक सेवा की सभी भर्ती अधिसूचनाओं पर लागू होगा।
  • चयनित होने वाले युवा वकीलों को पहले न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण और बाद में संरचित क्लर्कशिप से गुजरना होगा।

नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने न्यायिक सेवा परीक्षाओं में शामिल होने वाले वकीलों को बड़ी राहत दी है। [सुप्रीम कोर्ट का फैसला](cite: 1.1.1) आया है कि सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद के लिए वकालत का अनिवार्य अनुभव तीन साल से घटाकर एक साल कर दिया गया है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की तीन सदस्यीय बेंच ने 2:1 के बहुमत से अपने पिछले साल के फैसले में संशोधन करते हुए यह निर्देश जारी किया है।

पुराने फैसले में बदलाव और नया ढांचा

मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में सिविल जज पद के लिए न्यूनतम 3 साल की वकालत को अनिवार्य कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने माना कि बिना किसी संक्रमणकालीन व्यवस्था के अचानक तीन साल की शर्त लागू करने से युवा वकीलों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। अब नई व्यवस्था के तहत 1 अप्रैल 2027 से लागू होने वाली परीक्षाओं के लिए एक साल की वास्तविक वकालत होना जरूरी होगा, जिसे सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस के जरिए सत्यापित किया जाएगा।

प्रशिक्षण और क्लर्कशिप की होगी अनिवार्यता

अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल कम अनुभव के आधार पर चयन के बाद सीधा कार्यभार नहीं सौंपा जाएगा। चयनित उम्मीदवारों को पहले संबंधित राज्य न्यायिक अकादमी में एक साल का गहन प्रशिक्षण लेना होगा। इसके बाद एक साल की संरचित ‘लॉ क्लर्कशिप’ पूरी करनी होगी, जिसमें छह महीने जिला एवं सत्र न्यायाधीश और छह महीने हाईकोर्ट के मौजूदा जज के अधीन काम करना शामिल है। 31 मार्च 2027 तक जारी होने वाली अधिसूचनाओं के लिए छात्रों को विशेष छूट प्रदान की गई है।

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