आनंद बाजार पत्रिका के पत्रकारों पर एफआईआर की निंदा

'गेरुआ गुंडागर्दी' शब्द के इस्तेमाल को लेकर एबीपी संपादकीय टीम पर दर्ज मुकदमे के खिलाफ आए पत्रकार निकाय, प्रेस की स्वतंत्रता पर हमले का लगाया आरोप।

  • इंडियन वुमन्स प्रेस कोर (IWPC) और प्रेस एसोसिएशन ने आनंद बाजार पत्रिका (ABP) के पत्रकारों पर कोलकाता के बाउबाजार थाने में दर्ज एफआईआर की कड़ी निंदा की है।
  • यह एफआईआर एक हिंदू साधु शास्त्री महाराज की शिकायत पर 28 अगस्त 2026 को जादवपुर यूनिवर्सिटी में हुई हिंसक झड़पों के दौरान ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर दर्ज की गई है।
  • पत्रकार निकायों ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए एफआईआर को तुरंत वापस लेने और पत्रकारों को डराने-धमकाने की प्रवृत्ति को बंद करने की मांग की है।

समग्र समाचार सेवा
कोलकाता, 1 सितंबर: भारतीय मीडिया जगत में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पत्रकारों पर कार्रवाई को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है। इंडियन वुमन्स प्रेस कोर (IWPC) और प्रेस Association ने कोलकाता के बाउबाजार पुलिस स्टेशन में आनंद बाजार पत्रिका (ABP) की संपादक ईशानी दत्ता रॉय, मुख्य रिपोर्टर सोमा मुखर्जी और अन्य संपादकीय टीम के सदस्यों के खिलाफ 28 अगस्त 2026 को दर्ज कराई गई एफआईआर की कड़ी और एकस्वर में निंदा की है। यह पूरा मामला 19-20 अगस्त को जादवपुर यूनिवर्सिटी में भड़की हिंसक झड़पों की कवरेज के दौरान रिपोर्ट में ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ (Saffron Hooliganism) शब्द के इस्तेमाल से जुड़ा हुआ है।

क्या है पूरा विवाद और शिकायत का आधार?

शास्त्री महाराज नामक एक व्यक्ति, जिन्हें हिंदू साधु के रूप में वर्णित किया गया है, की शिकायत पर यह कानूनी कार्रवाई की गई है। शिकायतकर्ता ने अपनी आपत्ति में इस बात पर जोर दिया कि रिपोर्ट में इस्तेमाल किए गए शब्द से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची है। उन्होंने पुलिस से गहन जांच की मांग की है कि यह अभिव्यक्ति किसने सुझाई, किसने इसे स्वीकृत किया और किस-किस ने रिपोर्ट के संपादन और हेडलाइन तय करने में भूमिका निभाई। साथ ही यह भी जांचने की मांग की गई कि क्या इसके पीछे धार्मिक भावनाओं को गंभीर चोट पहुंचाने का कोई जानबूझकर किया गया षड्यंत्र था।

पत्रकार निकायों का कड़ा रुख और आपत्ति

पत्रकार संगठनों ने इस तरह की जांच और कानूनी शिकंजे को सीधे तौर पर पत्रकारों के काम में अनुचित हस्तक्षेप करार दिया है। उनका कहना है कि किसी भी मीडिया संस्थान में रिपोर्ट और उसकी भाषा का चयन प्रकाशन के स्थापित मानदंडों और संसदीय भाषा के दायरे में संपादकों द्वारा तय किया जाता है। किसी खास शब्द के इस्तेमाल को लेकर संपादकीय टीम के सदस्यों के नाम और पद मांगना सीधे तौर पर पत्रकारों को निशाना बनाने और उनके निष्पक्ष और बोना-फाइड (सद्भावनापूर्ण) काम को आपराधिक रंग देने जैसा है। पत्रकारों का मुख्य काम सच्चाई को उजागर करना है, जो कई बार कुछ लोगों के लिए असहज या अप्रिय हो सकता है, लेकिन यही लोकतंत्र की असली बुनियाद है।

राजनीतिक बयानबाजी और तीखी प्रतिक्रियाएं

विवाद उस समय और बढ़ गया जब उसी दिन पश्चिम बंगाल के राजनीतिक गलियारों से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। एक सार्वजनिक रैली को संबोधित करते हुए एक प्रमुख राजनेता ने आनंद बाजार पत्रिका द्वारा ‘सaffron hooliganism’ शब्द के इस्तेमाल के लिए सार्वजनिक माफी की मांग की और इसके बजाय दूसरे शब्दों के इस्तेमाल का सुझाव दिया। पत्रकार संगठनों ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि एक तरफ एक दक्षिणपंथी हिंदू साधु के आरोप और दूसरी तरफ राज्य के सर्वोच्च राजनीतिक मंचों की भाषा लगभग एक जैसी है। इस तरह का तालमेल एक स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए बिल्कुल भी शुभ संकेत नहीं है, जो कि लोकतंत्र का मुख्य प्राण वायु है।

फ्री प्रेस के समर्थन में उठी आवाजें

देश के प्रमुख प्रेस निकायों ने साफ तौर पर मांग की है कि राज्य और उसकी प्रशासनिक मशीनरी को पत्रकारों को डराने, धमकाने और उनकी आवाज को दबाने के लिए एफआईआर जैसे हथियारों का इस्तेमाल तुरंत बंद करना चाहिए। लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने के लिए एक स्वतंत्र प्रेस का होना अनिवार्य है। इसी को ध्यान में रखते हुए, संगठनों ने आनंद बाजार पत्रिका के पत्रकारों के खिलाफ दर्ज की गई सभी एफआईआर को तुरंत और बिना शर्त वापस लेने की पुरजोर मांग की है, ताकि मीडियाकर्मी बिना किसी डर के अपना पेशेवर दायित्व निभा सकें।

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