मोदी–पुतिन–शी की हाथ मिलाती तस्वीर: बदलती दुनिया में कूटनीति की उम्मीद

पूनम शर्मा

अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जब एक छोटी-सी तस्वीर या एक साधारण-सा इशारा लंबे भाषणों से कहीं अधिक प्रभाव छोड़ जाता है। बिश्केक में आयोजित 26वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाथ मिलाने और मुस्कुराने का क्षण ऐसा ही एक दृश्य है।

एससीओ नेताओं के पारंपरिक ‘फैमिली फोटो’ के लिए एकत्र होने के दौरान तीनों नेताओं का यह संक्षिप्त लेकिन आकर्षक क्षण कैमरे में कैद हुआ। वीडियो में तीनों नेता मुस्कुराते हुए और हाथ थामे नजर आए। क्रेमलिन पूल ने भी इस वीडियो को “Strategic alignment: Russia-India-China” के कैप्शन के साथ साझा किया।

निश्चित रूप से किसी एक तस्वीर को अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। भारत, रूस और चीन के अपने-अपने राष्ट्रीय हित, रणनीतिक प्राथमिकताएं और मतभेद हैं। लेकिन इसके बावजूद यह तस्वीर एक महत्वपूर्ण संदेश जरूर देती है—संवाद के दरवाजे बंद नहीं हुए हैं।

आज की दुनिया में यह संदेश पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।

भारत और रूस के संबंध दशकों पुराने और गहरे हैं। वहीं चीन के साथ भारत के संबंध जटिल रहे हैं, जिनमें सहयोग के अवसरों के साथ गंभीर मतभेद भी मौजूद हैं। रूस और चीन के बीच भी अपने रणनीतिक हित हैं। ऐसे में तीनों देशों के शीर्ष नेताओं का एक साथ सहज और सौहार्दपूर्ण दिखाई देना इस बात का संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बातचीत और संपर्क की अपनी अलग अहमियत है।

यही शायद बिश्केक की इस तस्वीर का सबसे सकारात्मक पक्ष है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्र या स्थायी शत्रु जैसी अवधारणाएं हमेशा व्यावहारिक नहीं होतीं। देशों के संबंध उनके राष्ट्रीय हितों, परिस्थितियों और रणनीतिक आवश्यकताओं से निर्धारित होते हैं। एक देश दूसरे से किसी मुद्दे पर असहमत हो सकता है, लेकिन दूसरे क्षेत्र में सहयोग भी कर सकता है। इसलिए कूटनीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यही है कि मतभेदों के बावजूद संवाद जारी रखा जाए।

भारत की विदेश नीति में यह व्यावहारिक दृष्टिकोण स्पष्ट दिखाई देता है।

भारत ने लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता को महत्व दिया है। वह अमेरिका और यूरोप के साथ अपने संबंध मजबूत कर रहा है, लेकिन रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को भी महत्व देता है। साथ ही भारत एससीओ और ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय है तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी अपनी भागीदारी बढ़ा रहा है।

इस बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की यही बहुआयामी कूटनीति उसकी एक बड़ी ताकत बन सकती है।

मोदी–पुतिन–शी की तस्वीर को इसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। इसे किसी नए राजनीतिक गठबंधन की घोषणा के रूप में देखना उचित नहीं होगा। न ही इसका अर्थ यह है कि तीनों देशों के बीच सभी मतभेद समाप्त हो गए हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंध इतने सरल नहीं होते।

लेकिन तस्वीर का महत्व फिर भी कम नहीं होता।

कूटनीति केवल समझौतों और घोषणापत्रों का नाम नहीं है। कूटनीति संवाद का वातावरण बनाने की कला भी है। नेताओं के बीच व्यक्तिगत संवाद, सहज मुलाकात और सकारात्मक सार्वजनिक व्यवहार कई बार कठिन मुद्दों पर बातचीत की जमीन तैयार करते हैं।

आज जब दुनिया कई तरह के संघर्षों, आर्थिक अनिश्चितताओं, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों से गुजर रही है, तब संवाद की आवश्यकता और बढ़ जाती है।

एससीओ जैसे मंच इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। अलग-अलग राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण रखने वाले देशों को एक ही मंच पर बैठने का अवसर मिलता है। सुरक्षा, आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक चुनौतियों जैसे विषयों पर बातचीत के लिए ऐसे मंच आवश्यक हैं।

बिश्केक का यह दृश्य दुनिया को एक और महत्वपूर्ण बात याद दिलाता है—मतभेद संवाद को समाप्त करने का कारण नहीं होने चाहिए।

आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति को अक्सर केवल दो खानों में बांटकर देखा जाता है—मित्र या दुश्मन, सहयोगी या प्रतिद्वंद्वी। लेकिन वास्तविक दुनिया इससे कहीं अधिक जटिल है। राष्ट्र किसी एक मुद्दे पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं और दूसरे मुद्दे पर सहयोग कर सकते हैं। वे गंभीर मतभेदों के बावजूद बातचीत जारी रख सकते हैं।

भारत के लिए यही संतुलित दृष्टिकोण भविष्य की कूटनीतिक शक्ति का आधार बन सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी, राष्ट्रपति पुतिन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुस्कुराती हुई तस्वीर को इसलिए केवल एक वायरल वीडियो या फोटो के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह एक प्रतीकात्मक क्षण है—एक ऐसा क्षण जो बताता है कि वैश्विक राजनीति में संवाद के लिए अभी भी जगह है।

भारत के सामने अवसर है कि वह अपनी बढ़ती वैश्विक भूमिका का इस्तेमाल रचनात्मक संवाद को बढ़ावा देने के लिए करे। राष्ट्रीय हितों की दृढ़ता से रक्षा करते हुए भी बातचीत के रास्ते खुले रखे जा सकते हैं। मजबूती और संवाद एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

अंततः बिश्केक का यह हाथ मिलाने वाला क्षण हमें यही याद दिलाता है कि दुनिया को केवल रणनीतिक शक्ति की नहीं, बल्कि संवाद के पुलों की भी जरूरत है।

21वीं सदी यदि टकराव के बजाय सहयोग की सदी बननी है, तो दुनिया के बड़े नेताओं को मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे से मिलते रहना होगा। मोदी, पुतिन और शी की यह तस्वीर उसी उम्मीद की एक सकारात्मक झलक है—तीन बड़ी शक्तियां, अपने अलग-अलग हितों और दृष्टिकोणों के बावजूद, एक क्षण के लिए साथ खड़ी दिखाई दीं।

बंटती हुई दुनिया में यह दृश्य केवल देखने लायक नहीं, बल्कि कूटनीति की ताकत पर भरोसा करने का कारण भी है।

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