प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की प्रासंगिकता पर सवाल
मीडिया नियामक संस्था पीसीआई में सक्रिय और जमीनी पत्रकारों के प्रतिनिधित्व को लेकर खड़ा हुआ बड़ा विवाद, उठ रही हैं सुधार की मांगें।
- प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) में सक्रिय पत्रकारों की अनुपस्थिति को लेकर देश भर के मीडिया जगत में गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
- वरिष्ठ पत्रकारों और मीडिया संगठनों का कहना है कि जब निकाय में जमीनी हकीकत जानने वाले पत्रकार ही नहीं हैं, तो इसकी प्रासंगिकता क्या रह जाती है।
- जानकारों का मानना है कि प्रेस की स्वतंत्रता और पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए पीसीआई के गठन और संरचना में बड़े बदलाव की जरूरत है।
नव ठकुरिया
नई दिल्ली, 5 सितंबर: भारतीय मीडिया जगत और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सर्वोच्च वैधानिक निकाय माने जाने वाले ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ (Press Council of India – PCI) की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर बहसों के केंद्र में आ गई है। मीडिया गलियारों में इन दिनों सबसे बड़ा सवाल यह गूंज रहा है कि जब देश की इस शीर्ष प्रेस नियामक संस्था में धरातल पर काम करने वाले वास्तविक और सक्रिय पत्रकार ही शामिल नहीं हैं, तो ऐसी संस्था की वर्तमान समय में प्रासंगिकता (Relevance) क्या रह जाती है? वरिष्ठ पत्रकारों, संपादकों और मीडिया विश्लेषकों ने पीसीआई की मौजूदा संरचना और इसके चयन बोर्ड पर तीखे सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। उनका तर्क है कि जिस संस्था का मुख्य उद्देश्य प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करना और पत्रकारिता के नैतिक मानकों को बनाए रखना है, यदि उसी में पत्रकारों की सीधी आवाज न हो, तो वह संस्था मीडिया के हितों का सही प्रतिनिधित्व कैसे कर सकती है।
क्या है प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का मुख्य उद्देश्य?
मूल रूप से प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना संसद द्वारा अधिनियमित ‘प्रेस काउंसिल अधिनियम, 1978’ के तहत की गई थी। इस वैधानिक संस्था का मुख्य दायित्व देश में प्रेस की स्वतंत्रता को संरक्षित करना, समाचार पत्रों और समाचार एजेंसियों की स्वतंत्रता को बनाए रखना और भारतीय पत्रकारिता के स्तर को ऊंचा उठाना है। इसके साथ ही, यह संस्था मीडिया और सरकार के बीच एक सेतु का काम करती है तथा पत्रकारों या मीडिया संस्थानों के खिलाफ आने वाली शिकायतों की सुनवाई करती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इस बात पर लगातार रोष व्यक्त किया जा रहा है कि इस संस्था के भीतर उन लोगों को पर्याप्त जगह नहीं मिल पा रही है जो वास्तव में दिन-रात फील्ड पर रहकर जमीनी पत्रकारिता की चुनौतियों का सामना करते हैं।
सक्रिय पत्रकारों के प्रतिनिधित्व का अभाव
आलोचकों और मीडिया संगठनों का यह स्पष्ट मानना है कि पीसीआई के मौजूदा बोर्ड और संरचना में नौकरशाहों, राजनीतिक नियुक्तियों या बड़े मीडिया घरानों के प्रबंधकों का वर्चस्व अधिक देखने को मिलता है। इसके विपरीत, छोटे, मध्यम और स्वतंत्र डिजिटल तथा प्रिंट मीडिया में काम करने वाले जमीनी पत्रकारों की आवाज वहां तक नहीं पहुंच पाती है। जब तक संस्था के निर्णय लेने वाले बोर्ड में उन लोगों को शामिल नहीं किया जाएगा जो रिपोर्टिंग की जमीनी सच्चाइयों, सुरक्षा के खतरों और आर्थिक तंगी से वाकिफ हैं, तब तक पत्रकारों के वास्तविक मुद्दों का समाधान निकलना असंभव है। यही कारण है कि आज देश भर के पत्रकार यह पूछने पर मजबूर हैं कि क्या यह संस्था केवल कागजी औपचारिकताओं तक सीमित होकर रह गई है।
संरचनात्मक सुधार की अत्यंत आवश्यकता
वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए मीडिया दिग्गजों और प्रेस संघों ने केंद्र सरकार और संबंधित विभागों से जोरदार मांग की है कि प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों और इसकी चयन प्रक्रिया में पारदर्शी एवं संरचनात्मक सुधार किए जाएं। संस्था में वास्तविक पत्रकारों, संपादकों और स्वतंत्र मीडिया कर्मियों का प्रतिनिधित्व अनिवार्य रूप से बढ़ाया जाना चाहिए ताकि यह निकाय अपनी स्वायत्तता, निष्पक्षता और मूल उद्देश्यों पर खरा उतर सके। यदि समय रहते इन गंभीर चिंताओं पर ध्यान नहीं दिया गया, तो देश के चौथे स्तंभ की रक्षा करने वाली इस शीर्ष संस्था का मूल उद्देश्य ही धूमिल हो जाएगा।
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