नावी पिल्लई को मिला 2026 का शांति नोबेल पुरस्कार

संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख नावी पिल्लई को मिला 2026 का प्रतिष्ठित शांति नोबेल पुरस्कार।

  • अंतरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने में उत्कृष्ट योगदान के लिए दक्षिण अफ्रीका की 85 वर्षीय न्यायाधीश नावी पिल्लई को 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है।
  • इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए खुद को प्रबल दावेदार बताने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक बार फिर इस दौड़ से बाहर रहे।
  • नोबेल समिति ने पिल्लई के संघर्ष, संघर्षों के पीड़ितों के लिए उम्मीद जगाने और वैश्विक स्तर पर कानून के शासन को मजबूत करने के उनके साहसी कार्यों की सराहना की है।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 9 अक्तूबर: वैश्विक मंच पर शांति और न्याय के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक घोषणा के तहत, संयुक्त राष्ट्र की पूर्व मानवाधिकार प्रमुख और दक्षिण अफ्रीका की प्रख्यात न्यायविद् नवनेथम ‘नावी’ पिल्लई को वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया है। नॉर्वे के ओस्लो स्थित नोबेल समिति ने शुक्रवार को इस पुरस्कार की घोषणा करते हुए दुनिया को याद दिलाया कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कानून का शासन ही वैश्विक शांति और संघर्षों के अहिंसक समाधान का असली आधार है। इस घोषणा के साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, जो खुद को इस पुरस्कार के लिए सबसे उपयुक्त दावेदार मान रहे थे, एक बार फिर इस दौड़ में पीछे छूट गए।

कौन हैं नावी पिल्लई? संघर्ष और सफलता की लंबी यात्रा

85 वर्षीय नावी पिल्लई का जीवन न्याय, समानता और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित रहा है। दक्षिण अफ्रीका की नागरिक पिल्लई ने अपने करियर की शुरुआत में इतिहास रचते हुए 1967 में अपने होमटाउन नेटाल में वकालत शुरू करने वाली पहली महिला बनने का गौरव हासिल किया था। अपने शुरुआती दौर में उन्होंने रंगभेद (Apartheid) नीति के खिलाफ लड़ने वाले कार्यकर्ताओं के पक्ष में कानूनी लड़ाई लड़ी और दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय अन्याय के खिलाफ मुखर आवाज़ उठाई। रंगभेद समाप्त होने के बाद 1995 में उन्हें दक्षिण अफ्रीकी उच्च न्यायालय में कार्यवाहक न्यायाधीश नियुक्त किया गया, जिसके बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों और संयुक्त राष्ट्र में अहम योगदान

नावी पिल्लई का प्रशासनिक और न्यायिक सफर बेहद शानदार रहा है। 1995 में ही उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (ICTR) में न्यायाधीश के रूप में चुना गया। इसके बाद, 1 सितंबर 2008 को उन्हें संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के पद पर नियुक्त किया गया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने दुनिया भर में मानवाधिकारों के हनन, हिंसा और युद्ध अपराधों के मामलों में देशों और बड़े राष्ट्रीय नेताओं को सीधे तौर पर जवाबदेह ठहराया। उनके इन साहसी फैसलों ने दुनिया भर के संघर्ष पीड़ितों के दिलों में एक नई उम्मीद जगाई।

गाजा जाँच आयोग और मानवाधिकारों की निष्पक्ष पैरवी

अपने करियर के उत्तरार्ध में भी नावी पिल्लई ने मानवाधिकारों की रक्षा से पीछे कदम नहीं हटाए। वह संयुक्त राष्ट्र के अधिकृत फिलिस्तीनी क्षेत्र जाँच आयोग की अध्यक्ष भी रहीं। इस आयोग ने पिछले वर्ष एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाला था, जिसमें गाजा में युद्ध के दौरान हुए गंभीर उल्लंघनों और नरसंहार जैसे मुद्दों पर कड़े सवाल उठाए गए थे, हालांकि इजराइल ने उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया था। पिल्लई की यह प्रतिबद्धता साबित करती है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानूनी सिद्धांतों और मानवीय गरिमा की सबसे मजबूत पैरोकारों में से एक हैं।

नोबेल समिति का आधिकारिक बयान और संदेश

नोबेल पुरस्कार समिति ने अपने आधिकारिक वक्तव्य में कहा कि आज के दौर में जब न्यायाधीशों पर प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं और स्वतंत्र संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं, ऐसे में साहस, दूरदर्शिता और दृढ़ संकल्प वाले व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है। नावी पिल्लई ने अपनी पूरी जिंदगी इसी दृढ़ता का परिचय दिया है। समिति ने जोर देकर कहा कि शांति और न्याय एक-दूसरे के पर्याय हैं, और बिना कानून के शासन के दुनिया पूरी तरह से अन्यायपूर्ण और अमानवीय हो सकती है। नावी पिल्लई को यह पुरस्कार मिलना पूरी दुनिया के मानवाधिकार प्रेमियों के लिए एक प्रेरणादायक क्षण है।

 

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