लद्दाख को अनुच्छेद 371 के तहत संवैधानिक सुरक्षा देने की तैयारी

लद्दाख के संवैधानिक भविष्य पर महत्वपूर्ण पहल

  • केंद्र सरकार लद्दाख को अनुच्छेद 371 के अंतर्गत विशेष संवैधानिक संरक्षण देने के प्रस्ताव पर बातचीत कर रही है।
  • केंद्र ने केंद्रशासित प्रदेश स्तर पर एक निर्वाचित निकाय के गठन का प्रस्ताव भी रखा है।
  • लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस ने प्रस्तावित व्यवस्था में पर्याप्त अधिकार नहीं होने पर आपत्ति जताई है।
  • बातचीत में गतिरोध के बावजूद केंद्र ने संवाद जारी रखने की इच्छा जताई है; अगली बैठक 22 अक्टूबर को प्रस्तावित है।

नई दिल्ली 18 अक्टूबर :  केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख में प्रशासनिक अधिकारों, स्थानीय पहचान और संवैधानिक संरक्षण को लेकर केंद्र सरकार तथा क्षेत्रीय प्रतिनिधियों के बीच चल रही बातचीत महत्वपूर्ण चरण में पहुँच गई है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अनुच्छेद 371 के अंतर्गत विशेष संवैधानिक सुरक्षा और एक निर्वाचित निकाय के गठन का प्रस्ताव रखा है। हालांकि स्थानीय संगठनों ने मौजूदा मसौदे पर असहमति व्यक्त की है।

लद्दाख के राजनीतिक भविष्य से जुड़ी यह बातचीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था।

तब से क्षेत्र में राज्य का दर्जा, स्थानीय रोजगार, भूमि अधिकार और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की मांग लगातार उठती रही है।

अनुच्छेद 371K के माध्यम से विशेष व्यवस्था का प्रस्ताव

केंद्र सरकार लद्दाख की विशिष्ट भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संविधान में नया अनुच्छेद 371K जोड़ने की संभावना पर विचार कर रही है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य स्थानीय हितों को संवैधानिक संरक्षण देना और प्रशासन में निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका सुनिश्चित करना है।

प्रस्तावित निकाय को विधायी, कार्यकारी, वित्तीय और नियोजन संबंधी अधिकार देने पर चर्चा हुई है। हालांकि इन अधिकारों का अंतिम स्वरूप अभी तय नहीं हुआ है।

स्थानीय संगठनों ने क्यों जताई आपत्ति?

लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस ने केंद्र के प्रस्ताव को अपनी मांगों की तुलना में अपर्याप्त बताया है।

स्थानीय प्रतिनिधि चाहते हैं कि प्रस्तावित निर्वाचित निकाय को कराधान, बजट, सार्वजनिक व्यय, भूमि और अन्य प्रशासनिक मामलों में प्रभावी अधिकार दिए जाएँ।

उनकी यह भी मांग है कि उपराज्यपाल तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों के बीच शक्तियों का स्पष्ट संवैधानिक विभाजन हो।

क्षेत्रीय नेतृत्व का तर्क है कि केवल एक निर्वाचित निकाय का गठन पर्याप्त नहीं होगा, जब तक उसके पास स्थानीय विकास और प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित करने की वास्तविक शक्ति न हो।

केंद्र ने बातचीत जारी रखने का दिया संकेत

18 अक्टूबर को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार ने मतभेदों के बावजूद बातचीत जारी रखने की इच्छा व्यक्त की है।

सरकार का कहना है कि लद्दाख के लिए प्रस्तावित संवैधानिक व्यवस्था बातचीत और सहमति से विकसित की जानी चाहिए।

केंद्र का यह भी मत है कि संविधान की छठी अनुसूची की मौजूदा व्यवस्था पूर्वोत्तर राज्यों की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप बनाई गई थी। इसलिए लद्दाख के लिए अलग संवैधानिक मॉडल पर विचार किया जा रहा है।

राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय आकांक्षाओं का प्रश्न

लद्दाख केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि भारत की सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण सीमावर्ती क्षेत्र है। इसकी सीमाएँ चीन और पाकिस्तान से जुड़ी हैं।

ऐसे क्षेत्र में प्रभावी प्रशासन, बुनियादी ढाँचे का विकास, स्थानीय भागीदारी और राष्ट्रीय सुरक्षा—सभी विषय महत्वपूर्ण हैं।

केंद्र के सामने चुनौती ऐसी संवैधानिक व्यवस्था विकसित करने की है जो लद्दाख की सांस्कृतिक पहचान और स्थानीय आकांक्षाओं को संरक्षण देते हुए प्रशासनिक स्थिरता सुनिश्चित करे।

22 अक्टूबर की बैठक पर नजर

आगामी बैठक में संवैधानिक संरक्षण, निर्वाचित निकाय की वास्तविक शक्तियों और राज्य का दर्जा देने की मांग पर चर्चा आगे बढ़ने की संभावना है।

फिलहाल कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ है। इसलिए प्रस्तावित व्यवस्था को लागू निर्णय के बजाय बातचीत के अधीन संवैधानिक पहल के रूप में देखा जाना चाहिए।

लद्दाख के भविष्य का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि प्रस्तावित संवैधानिक संरक्षण स्थानीय जनता को कितनी प्रभावी लोकतांत्रिक भागीदारी और प्रशासनिक अधिकार प्रदान कर सकेगा।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.