चीन के निर्यात नियंत्रण से भारत की सुरंग परियोजनाओं पर संकट की आशंका
स्वदेशी टनल बोरिंग मशीन निर्माण के लिए 1.2 अरब डॉलर की प्रोत्साहन योजना पर विचार
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चीन द्वारा टनल बोरिंग मशीनों (TBM) पर निर्यात नियंत्रण की खबरों से भारत की महत्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाओं के सामने नई चुनौती।
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भारत सरकार लगभग 1.2 अरब डॉलर, यानी करीब 10–11 हजार करोड़ रुपये की घरेलू विनिर्माण प्रोत्साहन योजना पर विचार कर रही है।
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मेट्रो रेल, रेलवे सुरंगों, सड़क परियोजनाओं और हिमालयी क्षेत्रों में रणनीतिक अवसंरचना के निर्माण के लिए TBM तकनीक अत्यंत महत्वपूर्ण।
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विदेशी उपकरणों पर निर्भरता कम करने के साथ स्वदेशी तकनीक, आपूर्ति शृंखला और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने की आवश्यकता।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली , 21 अक्टूबर : भारत में तेजी से विकसित हो रही मेट्रो रेल, रेलवे, राजमार्ग और सामरिक अवसंरचना परियोजनाओं के सामने चीन की निर्यात नियंत्रण नीति एक नई चुनौती बनकर उभर रही है। टनल बोरिंग मशीनों (TBM) और उनसे संबंधित महत्वपूर्ण उपकरणों के निर्यात पर चीन द्वारा नए प्रतिबंध लगाए जाने की रिपोर्टों ने भारत की विदेशी प्रौद्योगिकी पर निर्भरता को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
इन परिस्थितियों में केंद्र सरकार देश में ही अत्याधुनिक सुरंग निर्माण मशीनों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए लगभग 1.2 अरब डॉलर की प्रोत्साहन योजना पर विचार कर रही है।
प्रस्ताव का उद्देश्य घरेलू कंपनियों को उच्च तकनीक वाली मशीनों के निर्माण, अनुसंधान और महत्वपूर्ण कलपुर्जों के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करना है।
टनल बोरिंग मशीनें क्यों हैं महत्वपूर्ण?
टनल बोरिंग मशीनें आधुनिक अवसंरचना निर्माण की अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीक हैं। इनका उपयोग जमीन के भीतर सुरंगों की खुदाई के लिए किया जाता है।
भारत में दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और अन्य शहरों की मेट्रो परियोजनाओं के साथ रेलवे तथा सड़क सुरंगों के निर्माण में इन मशीनों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
विशेष रूप से घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में भूमिगत सुरंगों का निर्माण करते समय TBM तकनीक उपयोगी होती है, क्योंकि इससे सतह पर होने वाले व्यवधान को सीमित रखने में सहायता मिलती है।
हालांकि, इन मशीनों का निर्माण अत्यंत जटिल प्रक्रिया है। इनके लिए विशेष इस्पात, उच्च क्षमता वाले बेयरिंग, हाइड्रोलिक सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रण प्रणाली और अत्याधुनिक इंजीनियरिंग विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
विदेशी तकनीक पर निर्भरता बनी रणनीतिक चिंता
भारत ने पिछले एक दशक में अवसंरचना निर्माण के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार किया है। नई रेलवे लाइनों, मेट्रो नेटवर्क, राष्ट्रीय राजमार्गों और पर्वतीय सुरंगों के निर्माण पर बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है।
लेकिन इन परियोजनाओं में प्रयुक्त कुछ उच्च तकनीक वाले उपकरणों और महत्वपूर्ण कलपुर्जों के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता बनी हुई है।
चीन की निर्यात नीति में बदलाव से मशीनों की आपूर्ति, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स और परियोजनाओं की समयसीमा प्रभावित होने का जोखिम पैदा हो सकता है।
हालांकि, वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि निर्यात नियंत्रण किन मशीनों, तकनीकों और उपकरणों पर लागू होते हैं।
मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना भी चर्चा में
चीन के नए निर्यात नियंत्रण का प्रभाव भारत की पहली मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना पर भी पड़ सकता है। लगभग 508 किलोमीटर लंबे इस रेल गलियारे में समुद्र के नीचे लगभग सात किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण प्रस्तावित है।
वर्ष 2024 में जर्मनी की कंपनी हेरनक्नेख्ट (Herrenknecht) द्वारा चीन स्थित संयंत्रों में निर्मित मशीनों की आपूर्ति में सीमा शुल्क संबंधी देरी सामने आई थी। यह मुद्दा भारत और जर्मनी के बीच उच्चस्तरीय बातचीत में भी उठाया गया था।
चीन ने 19 अक्टूबर 2026 को नए निर्यात नियंत्रणों की घोषणा की है, जो 18 नवंबर 2026 से प्रभावी होंगे। इनके तहत संबंधित मशीनों और उपकरणों के निर्यात के लिए विशेष लाइसेंस आवश्यक होगा। यह पूर्ण निर्यात प्रतिबंध नहीं है।
सात वर्षों में 1.8 अरब डॉलर के निवेश की संभावना
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार लगभग 1.2 अरब डॉलर की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी देने की दिशा में काम कर रही है।
इस योजना से अगले सात वर्षों में लगभग 1.8 अरब डॉलर का नया निवेश आकर्षित होने की उम्मीद है।
सरकारी क्षेत्र की बीईएमएल (BEML) तथा लार्सन एंड टुब्रो जैसी कंपनियों को घरेलू निर्माण क्षमता के विस्तार से अवसर मिल सकते हैं। योजना में सुरंग निर्माण मशीनों के अतिरिक्त अग्निशमन उपकरणों और ऊंची इमारतों में उपयोग होने वाली लिफ्ट जैसी मशीनरी को भी शामिल किए जाने की संभावना है।
हालांकि, योजना को अंतिम सरकारी मंजूरी मिलने की पुष्टि अभी नहीं हुई है।
हिमालयी सीमावर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा महत्व
भारत के हिमालयी क्षेत्रों में सड़क, रेल और सुरंग निर्माण का महत्व केवल आर्थिक विकास तक सीमित नहीं है।
सीमावर्ती क्षेत्रों में बेहतर परिवहन व्यवस्था से सैनिकों, आवश्यक उपकरणों और राहत सामग्री की आवाजाही सुगम होती है। इसके अतिरिक्त दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को भी वर्षभर संपर्क सुविधाएं उपलब्ध कराने में सहायता मिलती है।
ऐसे में सुरंग निर्माण की अत्याधुनिक तकनीक में आत्मनिर्भरता भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक आवश्यकताओं से जुड़ी हुई है।
विदेशी आपूर्ति शृंखलाओं में किसी प्रकार की बाधा महत्वपूर्ण परियोजनाओं की लागत और समयसीमा को प्रभावित कर सकती है।
आत्मनिर्भर भारत के लिए तकनीकी क्षमता विकसित करने की चुनौती
भारत के सामने केवल विदेशी मशीनों का विकल्प तैयार करने की चुनौती नहीं है, बल्कि उच्च गुणवत्ता वाले उपकरणों का संपूर्ण घरेलू विनिर्माण तंत्र विकसित करना भी आवश्यक है।
इसके लिए अनुसंधान संस्थानों, इंजीनियरिंग कंपनियों, सार्वजनिक उपक्रमों और निजी उद्योगों के बीच समन्वय बढ़ाना होगा।
विशेषज्ञ इंजीनियरों का प्रशिक्षण, उच्च क्षमता वाले कलपुर्जों का निर्माण तथा अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप उत्पादन भी महत्वपूर्ण होगा।
तकनीकी आत्मनिर्भरता ही दीर्घकालिक समाधान
चीन की नई निर्यात नियंत्रण नीति ने भारत के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा किया है कि क्या तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था अपनी महत्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाओं के लिए विदेशी तकनीक पर अत्यधिक निर्भर रह सकती है।
भारत के लिए आवश्यक है कि वह वैकल्पिक अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं के साथ सहयोग बनाए रखते हुए घरेलू उत्पादन क्षमता को भी मजबूत करे।
यदि प्रस्तावित प्रोत्साहन योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो भारत भविष्य में अत्याधुनिक सुरंग निर्माण मशीनों का निर्माता और संभावित निर्यातक भी बन सकता है। यह पहल विकसित भारत 2047 के लक्ष्य के अंतर्गत औद्योगिक आत्मनिर्भरता, तकनीकी नवाचार और राष्ट्रीय अवसंरचना सुरक्षा को मजबूत करने में योगदान दे सकती है।
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