राकेश अचल
बांग्लादेश के दो नागरिकों को सऊदी अरब में मौत की सजा दिए जाने के बाद दोनों देशों के बीच गहरा कूटनीतिक संकट पैदा हो गया है। स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेशी अधिकारियों का कहना है कि मक्का के पवित्र शहर में हाल ही में दो बांग्लादेशी नागरिकों को दी गई मौत की सजा के बारे में उन्हें घटना के बाद ही पता चला।
इस घटना के बाद मुझे स ऊदी अरब में रहने वाले उन लाखों लोगों की चिंता सताने लगी है जो गमे रोजगार के चलते वहाँ रह रहे हैं। सऊदी अरब में कोई 27 लाख से ज्यादा भारतीय रहते हैं।भारतीय विदेश मंत्रालय और भारतीय दूतावास रियाद के आंकड़ों के अनुसार:मार्च 2026 तक लगभग 27.48 लाख भारतीय नागरिक वहां रह रहे थे।।फरवरी 2025 में यह संख्या 2,747,551 थी। 2024 में यह 26.45 लाख थी।
ये ज्यादातर नॉन-रेसिडेंट इंडियन्स हैं, जो काम के लिए गए हैं। इनमें निर्माण, स्वास्थ्य सेवा, घरेलू काम, आईटी, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों के मजदूर, पेशेवर और परिवार शामिल हैं।सऊदी अरब में भारतीय समुदाय सबसे बड़े प्रवासी समूहों में से एक है।
आपको पता ही होगा कि सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के अनुसार, एक मस्जिद के अंदर कथित “अश्लील कृत्य” करने का दोषी पाए जाने के बाद, पिछले बुधवार को एक पुरुष और महिला को मौत की सजा दे दी गई। दोनों बांग्लादेश के रहने वाले थे।मंत्रालय ने यह नहीं बताया कि वह कृत्य किस तरह का था।सऊदी अरब की सरकारी समाचार एजेंसी ‘सऊदी प्रेस एजेंसी’ ने बताया कि नजरुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिती अख़्तर ने मक्का की एक मस्जिद में ‘अश्लील कृत्य’ किया था।
बांग्लादेश का कहना है कि उसने इस मामले के बारे में और जानकारी मांगने के लिए सऊदी अरब की सरकार से संपर्क किया है। धार्मिक समानता और मजबूत आर्थिक संबंधों के कारण इन दोनों मुस्लिम देशों के बीच करीबी रिश्ते हैं। हालांकि सऊदी अरब अपने कानून के अनुपालन को लेकर काफी सख्त रुख अपनाता है।
उल्लेखनीय है कि सऊदी अरब में 30 लाख से ज़्यादा बांग्लादेशी रहते और काम करते हैं, जिनमें से ज़्यादातर कम वेतन वाली नौकरियों में हैं। इन दो लोगों को दी गई मौत की सजा से बांग्लादेश में लोगों के बीच चिंता पैदा हो गई है।
सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के अनुसार इन दो बांग्लादेशी नागरिकों को ‘ताजीर’ के तहत दोषी ठहराया गया और मौत की सजा सुनाई गई।इस्लामी कानून में ‘ताजीर’ का मतलब ऐसी सजाओं से है, जिन्हें तय करने का अधिकार जज के विवेक पर छोड़ दिया जाता है। मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि उन्हें यह सज़ा अपराध की गंभीरता को देखते हुए दी गई है, और इसलिए भी क्योंकि उन्होंने मस्जिद की ‘पवित्रता’ का उल्लंघन किया था।
अब मुश्किल ये है कि भारतवंशी गालिब के मुरीद भी हैं जो कहता है-
जाहिद शराब पीने दे मस्जिद मे बैठकर
या वो जगह बता कि जहाँ पर खुदा न हो।
मुझे नहीं पता कि गालिब कभी सऊदी अरब गये या नहीं।लेकिन यदि गए होते तो उन्हे भी शायद बख्शा नही जाता।मारे जाते वे।
भारत के लोग तो -‘ढाई आखर प्रेम को पढे सो पंडित होय,दो पाटन के बीच में साबित बचे न कोय। का दर्शन मानते हैं वे वहां मन मारकर रह रहे होंगे।या प्रेम-सेम सब भूल गए होंगे।
पूजाघरों की पाकीजगी हर मुल्क में होना चाहिए,लेकिन इतनी भी सख्त नही होना चाहिए कि गलती करने वालों की जान ही ले ली जाए। ये धार्मिक होने के साथ ही मानवाधिकार से जुडा मामला भी है।इसलिए इस पर बहस होना चाहिए कि जो कानून जिंदगी का मालिक ही नही है वो जिंदगी ले कैसे सकता है? क्या किसी को मौत के घाट उतारने का फरमान ऊपर वाले का है या ये हमारी अपनी व्यवस्था है।
मामला चूंकि एक दूसरे मुल्क का अंदरूनी मसला है इसलिए कोई टिप्पणी नही की जा सकती,फिर भी खबर हृदय विदारक है।दुनिया को खासतौर पर मानवाधिकार के संरक्षण की बात करने वालों को इस बाबद सोचना चाहिए।
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