क्या वैश्विक एक्टिविज़्म के पीछे उभर रहा है संगठित अंतरराष्ट्रीय तंत्र?
फ्रांस से भारत तक विरोध का नेटवर्क
पूनम शर्मा
दुनिया भर में विरोध-प्रदर्शन लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं। नागरिकों को सरकारों, नीतियों और संस्थाओं के खिलाफ आवाज उठाने का अधिकार है। लेकिन जब अलग-अलग देशों में चल रहे आंदोलनों के संदेश, संगठन, डिजिटल मंच और विचारधारात्मक नेटवर्क आपस में जुड़ते दिखाई दें, तब सवाल केवल विरोध का नहीं रह जाता—सवाल यह भी बनता है कि क्या स्थानीय असंतोष अब अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक नेटवर्कों के माध्यम से एक-दूसरे से जोड़ा जा रहा है?
यही प्रश्न फ्रांस से भारत तक हालिया प्रदर्शनों को लेकर उठाया गया है। फॉक्स न्यूज डिजिटल की एक खोजी रिपोर्ट ने दावा किया है कि नौ देशों में सक्रिय 101 संगठन एक ऐसे व्यापक “प्रोटेस्ट इकोसिस्टम” का हिस्सा हैं, जिसमें कम्युनिस्ट, समाजवादी, वामपंथी संगठन, ट्रेड यूनियन, छात्र समूह, एडवोकेसी नेटवर्क और कुछ इस्लामिस्ट संगठनों से जुड़े मंच शामिल हैं। फॉक्स न्यूज ने इसे “रेड-ग्रीन” नेटवर्क की संज्ञा दी है। यह एक गंभीर बात है
फ्रांस से भारत तक एक जैसा राजनीतिक शब्दकोश?
फ्रांस में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट ने उन संगठनों की पहचान करने का प्रयास किया जो इन आंदोलनों को आयोजित, समर्थन या डिजिटल रूप से प्रसारित व प्रचारित कर रहे थे। रिपोर्ट में भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों को भी व्यापक अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में रखा गया है। यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य Progressive International की 16 अक्टूबर की अपनी ब्रीफिंग है।
उस संगठन ने स्वयं फ्रांस, स्पेन, भारत और अल्बानिया के आंदोलनों को एक साझा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में रखा और लिखा कि वह इन राजनीतिक और सामाजिक ताकतों को सहयोग एवं जोड़ने के लिए काम कर रहा है। यह कोई बाहरी आरोप नहीं, बल्कि संगठन की अपनी घोषित राजनीतिक भूमिका है। “जोड़ना” और “नियंत्रित करना” गंभीर बातें हैं जिनपर ध्यान देना आवश्यक है ।
किसी संगठन द्वारा आंदोलनों के बीच संपर्क स्थापित करना, उनके संदेशों को करना या वैचारिक एकजुटता व्यक्त करना यह प्रमाणित करता कि वह हर विरोध-प्रदर्शन को संचालित कर रहा है। इसको समझना जरूरी है।
आधुनिक आंदोलन अब स्थानीय नहीं रहे
21वीं सदी के विरोध आंदोलनों का स्वरूप बदल चुका है। सोशल मीडिया, डिजिटल फंडिंग, लाइव स्ट्रीमिंग, अंतरराष्ट्रीय NGOs, मीडिया प्लेटफॉर्म और एक्टिविस्ट नेटवर्क किसी भी स्थानीय आंदोलन को कुछ घंटों में वैश्विक मुद्दा बना सकते हैं।
फ्रांस में छात्रों की नाराजगी हो, स्पेन में आवास का संकट, भारत में चुनावी संस्थाओं को लेकर विरोध या किसी अन्य देश में आर्थिक असंतोष—इन सभी मुद्दों की स्थानीय पृष्ठभूमि अलग हो सकती है। फिर भी अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए इन्हें एक साझा राजनीतिक कहानी में पिरोना संभव है। यही वह स्थान है जहां लोकतांत्रिक अधिकार और राजनीतिक प्रभाव के बीच की रेखा में एक संबंध स्थापित होता है ।
विदेशी फंडिंग का प्रश्न भी गंभीर है
फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट में BreakThrough News, CODEPINK और Party for Socialism and Liberation जैसे संगठनों का उल्लेख किया गया है और Neville Roy Singham से उनके कथित आर्थिक या राजनीतिक संबंधों की चर्चा की गई है। ऐसे आरोप पहले भी अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है।
किसी संगठन को वित्तीय सहायता मिलना अपने-आप यह साबित करता है कि वह हिंसा, शासन परिवर्तन या किसी सरकार को अस्थिर करने की योजना का हिस्सा है। ऐसे गंभीर आरोपों के लिए बैंकिंग रिकॉर्ड, निर्देश, संचालनात्मक संपर्क या अन्य प्रमाण भी उपलब्ध हैं जो इस बात की सत्यता को प्रमाणित करते हैं ।
लोकतंत्रों को विदेशी वित्तपोषण की पारदर्शिता पर कठोर होना चाहिए। यदि कोई संगठन किसी देश की राजनीतिक प्रक्रिया, चुनावी संस्थाओं या जनमत को प्रभावित करने का प्रयास करता है, तो उसके धन के स्रोत और अंतरराष्ट्रीय संपर्क सार्वजनिक जांच के दायरे में होने चाहिए।
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सबक
भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में असहमति आंदोलन के रूप में विदेशी षड्यंत्र हैं विदेशी नेटवर्कों की संभावित भूमिका की जांच आवश्यक है ।
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति इसी संतुलन में है। एक ओर नागरिकों को विरोध, आलोचना और आंदोलन का संवैधानिक अधिकार है। दूसरी ओर सरकार और सुरक्षा संस्थाओं का दायित्व है कि यह सुनिश्चित करें कि विदेशी धन, गुप्त राजनीतिक नेटवर्क या डिजिटल दुष्प्रचार लोकतांत्रिक असंतोष को हिंसक या असंवैधानिक दिशा में न धकेलें।
असली प्रश्न ‘कौन विरोध कर रहा है’ नहीं, ‘कौन जोड़ रहा है’ है
फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट ने कम से कम एक महत्वपूर्ण बहस शुरू की है। आज राजनीतिक आंदोलनों को केवल उनकी सड़क पर दिखाई देने वाली भीड़ से नहीं समझा जा सकता।
उनके डिजिटल नेटवर्क, फंडिंग, अंतरराष्ट्रीय साझेदार, सोशल मीडिया amplification और राजनीतिक संदेशों की जांच जरूरी है। लेकिन उसी के साथ यह भी उतना ही आवश्यक है कि हर विरोध को “विदेशी साजिश” कहकर लोकतांत्रिक असहमति को अपराध न बना दिया जाए।
सबसे स्वस्थ लोकतांत्रिक रास्ता है—पारदर्शिता, प्रमाण और जवाबदेही। यदि कोई अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क केवल वैचारिक सहयोग कर रहा है, तो उसे उसी रूप में देखा जाना चाहिए। यदि कोई नेटवर्क राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने के लिए धन, रणनीति या हिंसक संरचना उपलब्ध करा रहा है, तो उसके प्रमाण सामने आने चाहिए और कानून को कार्रवाई करनी चाहिए।
लोकतंत्र न तो भोला रह सकता है, न भयभीत। उसे जागरूक रहना होगा। क्योंकि आधुनिक राजनीति में लड़ाई केवल सड़कों पर नहीं होती—वह नेटवर्क, नैरेटिव और सूचना के माध्यम से भी लड़ी जाती है।
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