लालू की गुगली से चूके बीजेपी दिग्गज, एमएलसी चुनाव में मात
बिहार विधान परिषद चुनाव में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की सवर्ण साधने की रणनीति ने बीजेपी को चौंकाया, पटना और दरभंगा में हारी सत्ताधारी पार्टी.
- लालू यादव की सवर्ण-दल समीकरण रणनीति से बिखरा एनडीए वोट बैंक।
- पटना शिक्षक और दरभंगा स्नातक सीट पर राजद उम्मीदवारों की जीत।
- बीजेपी के दशकों पुराने मजबूत सियासी किलों में हुआ बड़ा उलटफेर।
समग्र समाचार सेवा
पटना, 30 अक्तूबर: बिहार की राजनीति में एक बार फिर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक दूरदर्शिता और ‘गुगली’ ने सबको हैरान कर दिया है। हाल ही में संपन्न हुए बिहार विधान परिषद (MLC) स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव परिणामों ने एनडीए खेमे में चिंता की लकीरें खींच दी हैं। खासतौर पर राजधानी पटना और मिथिलांचल के गढ़ माने जाने वाले दरभंगा में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वर्षों पुराने किलों को ध्वस्त किया गया है, उसके पीछे लालू यादव की सवर्ण साधने की सोची-समझी रणनीति को सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है।
पारंपरिक रूप से ए टू जेड (A to Z) की बात करने वाले लालू प्रसाद ने इस बार के एमएलसी चुनावों में बेहद करीने से सवर्ण जातियों (विशेषकर भूमिहार और ब्राह्मण समाज) के मजबूत चेहरों पर दांव खेला और मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण के साथ सवर्णों के इस नए गठजोड़ ने सियासी समीकरणों को पूरी तरह पलट कर रख दिया।
पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में ढहा बीजेपी का तीन दशक पुराना किला
इस चुनाव का सबसे बड़ा उलटफेर पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में देखने को मिला, जहां पिछले लगभग 30 वर्षों से बीजेपी समर्थित या दिग्गज नेता प्रो. नवल किशोर यादव का एकछत्र राज हुआ करता था। इस बार राजद ने इस प्रतिष्ठित सीट को चुनौती के रूप में लिया और रणनीतिक रूप से भूमिहार समुदाय से आने वाले डॉ. संजीव कुमार को मैदान में उतार दिया।
डॉ. संजीव कुमार की पृष्ठभूमि भले ही जदयू से जुड़ी रही हो, लेकिन उन्होंने राजद का दामन थामकर चुनाव में ताल ठोकी। राजद सुप्रीमो लालू यादव का यह सामाजिक समीकरण पूरी तरह सटीक बैठा। भूमिहार मतदाताओं के एक बड़े वर्ग का समर्थन और एम-वाय समीकरण की एकजुटता के कारण डॉ. संजीव ने भारी अंतर से जीत हासिल कर ली। इस हार को डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी और स्थानीय बीजेपी नेतृत्व के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है।
दरभंगा स्नातक सीट पर भी राजद की धमाकेदार जीत
कुछ ऐसा ही नजारा दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी देखने को मिला, जहां लंबे समय से एनडीए समर्थित उम्मीदवार का कब्जा रहा था। यहां राजद ने अनिल कुमार झा को अपना उम्मीदवार बनाया। पार्टी की रणनीति साफ थी—ब्राह्मण मतदाताओं के बीच मजबूत पकड़ रखने वाले चेहरे को आगे कर सत्ताधारी दल के वोट बैंक में सेंध लगाना।
मतगणना के जो नतीजे सामने आए, उसने सबको चौंका दिया। जीत की माला अंततः राजद के अनिल कुमार झा के गले पड़ी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दरभंगा और पटना के इन परिणामों ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही सामाजिक संयोजन (Social Engineering) बैठाया जाए, तो पारंपरिक रूप से बीजेपी के साथ माने जाने वाले सवर्ण मतदाता भी विपक्षी दलों के पाले में आ सकते हैं।
लालू यादव की पुरानी शैली और ‘सवर्ण कार्ड’ की वापसी
राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि लालू यादव ने एक बार फिर अपनी उस पुरानी सियासी शैली की झलक दिखाई है, जिसके तहत वे सत्ता में रहते हुए भी जगदानंद सिंह (जगत बाबू), रघुवंश प्रसाद सिंह (रघुवंश बाबू) और डॉ. रघुनाथ पांडेय जैसे दिग्गज सवर्ण नेताओं को आगे रखकर पार्टी का दायरा बढ़ाते थे।
विधानसभा चुनाव और आगामी राजनीतिक भविष्य की लड़ाइयों से पहले एमएलसी चुनाव के इन परिणामों ने राजद के खेमे में नई जान फूंक दी है। जेडीयू और बीजेपी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान के बीच राजद का यह प्रयोग आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति की दशा और दिशा दोनों तय कर सकता है।
निष्कर्ष
बिहार विधान परिषद के इन चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल एक खास समीकरण के भरोसे चुनाव नहीं जीते जा सकते। लालू यादव की इस सवर्ण सेंधमारी वाली रणनीति ने सत्ताधारी एनडीए के बड़े दिग्गजों को आत्मમंथन करने पर मजबूर कर दिया है।
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