धर्मांतरण आरक्षण पर SC फैसले के खिलाफ जाएगी विजय सरकार

मजहब बदलकर मुस्लिम बने लोगों को आरक्षण न देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ तमिलनाडु की थलपति विजय सरकार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करेगी।

  • सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण को खारिज किया।
  • तमिलनाडु की विजय सरकार ने फैसले के खिलाफ पुनर्विचार का लिया फैसला।
  • कैबिनेट बैठक में कानूनी पहलुओं पर चर्चा के बाद उठाया गया कदम।

समग्र समाचार सेवा
चेन्नई, 31 अक्तूबर: देश में आरक्षण की व्यवस्था और धार्मिक पहचान को लेकर कानूनी गलियारों में एक बार फिर बड़ी हलचल तेज हो गई है। कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट किया था कि यदि कोई व्यक्ति अपनी पुरानी हिंदू सामाजिक व्यवस्था या जातिगत पहचान को छोड़कर इस्लाम या अन्य धर्म अपना लेता है, तो उसे केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर पिछड़े वर्ग (OBC) या अन्य श्रेणियों के तहत आरक्षण का लाभ स्वतः प्राप्त नहीं हो सकता। शीर्ष अदालत के इस फैसले के बाद अब दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु से एक बड़ा राजनीतिक और कानूनी कदम सामने आया है।

तमिलनाडु की थलपति विजय (Thalapathy Vijay) सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से असहमति जताते हुए इसके खिलाफ सर्वोच्च अदालत में पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दाखिल करने का बड़ा निर्णय लिया है। राज्य के कानून मंत्री सीटीआर निर्मल कुमार ने हाल ही में संपन्न हुई कैबिनेट बैठक के बाद इस बात की आधिकारिक जानकारी दी है।

क्या था सुप्रीम कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला?

यह पूरा कानूनी विवाद तमिलनाडु सरकार के उस शासनादेश (Government Order) से जुड़ा है, जिसे राज्य में 9 मार्च 2024 को जारी किया गया था। इस आदेश के तहत यह व्यवस्था दी गई थी कि पिछड़ा वर्ग (BC), अति पिछड़ा वर्ग (MBC), विमुक्त समुदायों और अनुसूचित जातियों (SC) के ऐसे लोग जो इस्लाम धर्म अपना लेते हैं, उन्हें राज्य में अधिसूचित सात मुस्लिम पिछड़ा वर्ग समुदायों में से किसी एक का सदस्य मानकर समुदाय प्रमाण पत्र (Community Certificate) जारी किया जा सके।

इस आदेश के खिलाफ मामला मद्रास हाई कोर्ट पहुंचा था, जहां अदालत ने इस शासनादेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण का लाभ प्राप्त करने के लिए केवल पूर्ववर्ती सामाजिक स्थिति या पुराना जाति प्रमाण पत्र आधार नहीं बन सकता। अदालत ने यह भी कहा कि हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के दायरे से बाहर जाने पर अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाता है।

थलपति विजय सरकार का पक्ष और राजनीतिक मायने

सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्य सरकार के आदेश को खारिज किए जाने के बावजूद, थलपति विजय की अगुवाई वाली सरकार ने इस मामले में पीछे हटने के बजाय कानूनी लड़ाई को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। राज्य कैबिनेट की बैठक में यह तय किया गया कि इस महत्वपूर्ण सामाजिक कल्याण से जुड़े मुद्दे पर अदालत के समक्ष पुनर्विचार याचिका दाखिल की जानी चाहिए।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तमिलनाडु की राजनीति में अल्पसंख्यक मतदाताओं और विशेषकर मुस्लिम समाज का समर्थन हासिल करना सभी प्रमुख दलों की रणनीति का अहम हिस्सा रहा है। द्रविड़ राजनीति की पारंपरिक धारा के अनुरूप, विजय सरकार का यह कदम राज्य के उन वर्गों को यह संदेश देने का प्रयास है कि सरकार उनके अधिकारों और कल्याणकारी योजनाओं की सुरक्षा के लिए हरसंभव कानूनी कदम उठाने के लिए तैयार है। हालांकि, विरोधी दलों का यह भी कहना है कि इस तरह के कदम विशुद्ध रूप से आगामी राजनीतिक समीकरणों और वोट बैंक को साधने की कवायद हैं।

कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएं

सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद कानूनी जानकारों का मानना है कि पुनर्विचार याचिका में राज्य सरकार को यह साबित करना होगा कि धर्म परिवर्तन के बाद भी सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन किस प्रकार बरकरार रहता है। संविधान के प्रावधानों और पूर्ववर्ती न्यायिक दृष्टांतों के तहत किसी समुदाय को आरक्षण के दायरे में लाने के लिए कड़े संवैधानिक परीक्षण से गुजरना होता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में यह कानूनी जंग आने वाले दिनों में देश भर के आरक्षण ढांचे के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकती है।

निष्कर्ष

तमिलनाडु की थलपति विजय सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल करने के फैसले ने राज्य के राजनीतिक और कानूनी गलियारों में सरगर्मी बढ़ा दी है। एक तरफ जहां यह कदम राज्य की सामाजिक न्याय नीति का हिस्सा बताया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ यह देश में धर्म और आरक्षण के संबंधों पर एक राष्ट्रीय स्तर की बड़ी कानूनी बहस को भी पुनर्जीवित कर रहा है।

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