सोशल मीडिया मंचों की कानूनी ढाल पर पुनर्विचार

सरकार ‘सुरक्षित आश्रय’ व्यवस्था में बड़े बदलाव पर कर रही विचार

  • सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय सामाजिक मीडिया मंचों को तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए मिलने वाली कानूनी सुरक्षा की समीक्षा कर रहा है।
  • फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स जैसे मंचों के लिए मौजूदा “सुरक्षित आश्रय” व्यवस्था सीमित करने पर विचार।
  • सरकार का तर्क—जटिल कलन-विधि सामग्री को केवल वहन नहीं करती, बल्कि उसकी दृश्यता और प्रसार भी तय करती है।
  • अभी चर्चा प्रारंभिक स्तर पर है; किसी भी व्यापक बदलाव के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम में संशोधन और संसद की मंजूरी आवश्यक हो सकती है।

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 5 नवंबर : भारत सरकार सामाजिक मीडिया कंपनियों की कानूनी जिम्मेदारी को लेकर एक बड़े नियामक बदलाव पर विचार कर रही है। सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के भीतर इस बात पर चर्चा शुरू हुई है कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स जैसे सामाजिक मीडिया मंचों को उपयोगकर्ताओं द्वारा डाली गई सामग्री के लिए मिलने वाली मौजूदा कानूनी सुरक्षा जारी रहनी चाहिए या नहीं।

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के तहत इंटरनेट मध्यस्थों को कुछ शर्तों के साथ तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए कानूनी जिम्मेदारी से सुरक्षा मिलती है। इसका मूल सिद्धांत यह था कि मंच स्वयं सामग्री का प्रकाशक नहीं, बल्कि उसे पहुंचाने वाला माध्यम है।

लेकिन सरकार के भीतर उभर रही सोच यह है कि आधुनिक सामाजिक मीडिया मंच अब केवल निष्क्रिय संदेशवाहक नहीं रहे। उनकी कलन-विधियां तय करती हैं कि कौन-सी सामग्री किस उपयोगकर्ता तक पहुंचेगी, किस पोस्ट को अधिक दृश्यता मिलेगी और कौन-सी सामग्री तेजी से प्रसारित होगी।

सामाजिक मीडिया और संपादकीय नियंत्रण का प्रश्न

सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि जब कोई मंच सामग्री को क्रमबद्ध करता है, सुझाता है, बढ़ावा देता है या अपने सामुदायिक मानकों के आधार पर हटाता है, तो उसकी भूमिका पारंपरिक दूरसंचार माध्यम से अलग हो जाती है।

इसी कारण सरकार यह विचार कर रही है कि “सुरक्षित आश्रय” की पूर्ण सुरक्षा केवल इंटरनेट सेवा प्रदाताओं, दूरसंचार सेवा प्रदाताओं अथवा ऐसे माध्यमों तक सीमित की जाए जो केवल सूचना पहुंचाने का काम करते हैं। सामाजिक मीडिया कंपनियों के लिए अलग कानूनी व्यवस्था बनाने की संभावना पर विचार हो रहा है।

हालांकि अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

डीपफेक और हानिकारक सामग्री भी चिंता का कारण

सरकार की चिंता केवल राजनीतिक सामग्री तक सीमित नहीं है। डीपफेक, अश्लील या बिना सहमति साझा की गई तस्वीरें, बाल यौन शोषण सामग्री, धोखाधड़ी और भ्रामक विज्ञापनों जैसे मामलों में सामाजिक मीडिया कंपनियों की जवाबदेही पर भी लगातार सवाल उठे हैं।

सरकार उपयोगकर्ताओं की शिकायतों पर तेज कार्रवाई, हानिकारक सामग्री हटाने के लिए मजबूत व्यवस्था और महत्वपूर्ण तकनीकी बदलाव लागू करने से पहले अधिकारियों को सूचना देने जैसे विकल्पों पर भी विचार कर रही है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम जवाबदेही

यदि यह प्रस्ताव कानून का रूप लेता है, तो भारत की डिजिटल व्यवस्था में बड़ा बदलाव हो सकता है। कंपनियों की जिम्मेदारी बढ़ सकती है, लेकिन इसके साथ यह बहस भी तेज होगी कि अधिक कानूनी जोखिम के कारण मंच वैध आलोचनात्मक सामग्री को भी जरूरत से ज्यादा हटाने लगेंगे या नहीं।

इसलिए आने वाली नीति में उपयोगकर्ता सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मंचों की जवाबदेही—इन तीनों के बीच संतुलन सबसे बड़ी चुनौती होगा।

महत्त्व

भारत दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक मीडिया बाजारों में से एक है। इसलिए “सुरक्षित आश्रय” व्यवस्था में कोई भी बड़ा बदलाव न केवल तकनीकी कंपनियों बल्कि डिजिटल पत्रकारिता, राजनीतिक संवाद, स्वतंत्र अभिव्यक्ति और आम उपयोगकर्ताओं पर भी व्यापक असर डाल सकता है।

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