घटती प्रजनन दर के बीच दो-बच्चे की शर्त पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल
कहा—पुराने कानूनों की प्रासंगिकता घटी
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानूनों की प्रासंगिकता अब घट चुकी है।
- अदालत ने भारत की कुल प्रजनन दर 2003 के लगभग 3 से घटकर वर्तमान में 1.9 होने का उल्लेख किया।
- 2.1 की प्रतिस्थापन प्रजनन दर से नीचे जाने पर भविष्य में बुजुर्ग आबादी बढ़ने और कार्यशील आबादी का हिस्सा घटने की आशंका।
- अदालत ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी पीठ को भेज दिया।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 5 नवंबर: सुप्रीम कोर्ट ने भारत में तेजी से बदलती जनसांख्यिकीय स्थिति को देखते हुए दो-बच्चे की नीति से जुड़े पुराने कानूनी प्रावधानों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर किसी व्यक्ति को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानूनों के पीछे जो जनसंख्या नियंत्रण का तर्क था, वह बदलती प्रजनन दर के कारण अब पहले जैसा प्रासंगिक नहीं रह गया है।
अदालत ने कहा कि 2003 में जब जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले में दो-बच्चे की शर्त को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया गया था, तब भारत की कुल प्रजनन दर लगभग 3 थी। अब यह घटकर करीब 1.9 रह गई है, जो 2.1 की प्रतिस्थापन दर से भी नीचे है।
क्या भारत के सामने अब उलटी जनसांख्यिकीय चुनौती?
सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि प्रजनन दर लंबे समय तक प्रतिस्थापन स्तर से नीचे बनी रहती है, तो भविष्य में भारत की आबादी की संरचना बदल सकती है। बुजुर्गों की संख्या बढ़ सकती है और कामकाजी उम्र की आबादी का अनुपात घट सकता है। इससे श्रम बाजार, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन व्यवस्था और आर्थिक वृद्धि पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।
अदालत ने इसीलिए कहा कि जनसंख्या वृद्धि रोकने के उद्देश्य से बनाए गए पुराने कानूनों को नई जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं की कसौटी पर फिर से परखा जाना चाहिए।
महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच का मामला बना आधार
यह मामला महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका से जुड़ा है। उन्हें तीसरे बच्चे के जन्म के बाद महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत अयोग्य ठहरा दिया गया था। अतिरिक्त कलेक्टर और बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उनकी अयोग्यता को बरकरार रखा था। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ अयोग्यता संबंधी कार्यवाही पर रोक लगाई और व्यापक संवैधानिक प्रश्न को बड़ी पीठ के पास भेज दिया।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रजनन स्वायत्तता का सवाल
अदालत ने यह भी कहा कि दो से अधिक बच्चों के आधार पर किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकना राजनीतिक प्रतिनिधित्व और प्रजनन स्वायत्तता से जुड़े गंभीर संवैधानिक प्रश्न पैदा करता है।
पीठ ने कहा कि ऐसी व्यवस्था नागरिकों को बच्चे पैदा करने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने के बीच कठिन चुनाव करने के लिए मजबूर कर सकती है। अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता के अधिकार से भी जोड़ा।
राज्यों में एक समान नीति नहीं
देशभर में दो-बच्चे की नीति को लेकर एक समान व्यवस्था नहीं है। अदालत के सामने रखी गई जानकारी के अनुसार, कुछ राज्यों ने ऐसी शर्तें समाप्त कर दी हैं, जबकि कुछ राज्यों में स्थानीय निकाय चुनावों या सरकारी पदों से संबंधित प्रावधान अब भी लागू हैं। इनमें असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे राज्य शामिल बताए गए हैं।
महत्त्व
यह मामला केवल पंचायत चुनाव की योग्यता तक सीमित नहीं है। यह भारत की बदलती जनसंख्या संरचना, प्रजनन अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भविष्य की जनसंख्या नीति से जुड़ा बड़ा संवैधानिक प्रश्न बन गया है।
यदि बड़ी पीठ पुराने फैसले पर पुनर्विचार करती है, तो कई राज्यों में लागू दो-बच्चे से जुड़े प्रतिबंधों की वैधता पर व्यापक असर पड़ सकता है।
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