स्वतंत्र देव और असीम अरूण क्यों नहीं बन पाए डिप्टी सीएम

त्रिदीब रमण
त्रिदीब रमण

त्रिदीब रमण।       

तेरी रहबरी पर अब भी है इतना यकीं मुझको

सरे राह लूटा गया हूं, पर तू मेरा खुदा है’

उत्तर प्रदेश में इस बार भगवा आंगन में संतुलन, सामंजस्य और परस्पर त्याग की राजनीति देखने को मिल रही है। यूपी में योगी विरोधी खेमे को एक हद तक धार देने के बाद उनके हौसलों को भी कुंद किया गया है। बात योगी मंत्रिमंडल के गठन की करें तो योगी ने जो लिस्ट अपनी ओर से हाईकमान को सौंपी थी उसमें डिप्टी सीएम के तौर पर तीन नाम दिए गए थे, केशव प्रसाद मौर्य की काट के रूप में स्वतंत्र देव सिंह का नाम था, जो वहां पिछड़ी राजनीति के झंडाबरदारों में शुमार होते हैं। योगी ने दिनेश शर्मा की जगह एक ब्राह्मण चेहरे ब्रजेश पाठक का नाम दिया था अपने डिप्टी नंबर दो के लिए। डिप्टी नंबर तीन के लिए योगी ने एक जाटव अफसर असीम अरूण का नाम सुझाया था। वहीं दिल्ली की लिस्ट में डिप्टी सीएम के लिए जो तीन नाम शामिल थे, वे थे केशव प्रसाद मौर्य (पिछड़ा), एके शर्मा (भूमिहार) और बेबी रानी मौर्य (दलित)। फिर संतुलन व सामंजस्य बिठाने की सियासी बाजीगरी शुरू हुई। कहते हैं जब योगी केशव प्रसाद मौर्य के लिए कतई तैयार नहीं हो रहे थे तो उन्हें समझाया गया कि भाजपा ने 2017 का चुनाव भी मौर्य के चेहरे पर लड़ा था, तब वे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे। इस बार भी पिछड़े वोट थोकभाव में मौर्य की वजह से ही भाजपा को मिले। फिर समझौता का प्रारूप तय हुआ और दोनों पक्षों में सहमति बनी कि एक उप मुख्यमंत्री योगी की लिस्ट से होगा और दूसरा दिल्ली की लिस्ट से। मौर्य के पीछे चूंकि अमित शाह चट्टान की तरह खड़े थे, तो योगी ने अपने हिस्से की लिस्ट से ब्रजेश पाठक का नाम चुन लिया।

सिद्धार्थ और श्रीकांत की कैसे हुई छुट्टी?

नए दौर की इस नई भाजपा में एक बात तो तय है कि जो जितना दिखेगा, उसका ही टिकट कटेगा। यानी जो नेता ज्यादा हाई प्रोफाइल होगा या जिनमें छपास की भूख ज्यादा होगी, उसे दरकिनार कर दिया जाता है। योगी कैबिनेट के दो चमकते चेहरे जो दिल्ली की आभा से प्रज्ज्वलित थे, उनके सफर का दीया लखनऊ में बुझ गया यानी श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थनाथ सिंह दोनों की छुट्टी हो गई। ये दोनों चेहरे टीवी और अखबारों के लिए बेहद मुफीद और लोकप्रिय चेहरे थे। राज्य सरकार की ओर से मीडिया ब्रीफिंग की जिम्मेदारी भी इनको मिली हुई थी। श्रीकांत शर्मा तो भाजपा के एक प्रमुख नेता के खास दुलारों में शुमार होते हैं, सो माना जा रहा है कि इन्हें पार्टी संगठन में कोई महती जिम्मेदारी मिल सकती है। सूत्रों का कहना है कि जब इस दफे के चुनाव में भाजपा उम्मीदवारों की लिस्ट फाईनल हो रही थी तो प्रत्याशियों की अंतिम लिस्ट में से इन दोनों के नाम काट दिए गए थे। खास कर सिद्धार्थनाथ सिंह पर पार्टी कैडर लगातार यह आरोप लगा रहा था कि मंत्री बनने के बाद उनके धन संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि हुई है। पर देखिए कैसे बिल्ली के भाग्य से छींका टूटता है, जब पार्टी अपने उम्मीदवारों की लिस्ट को अंतिम रूप दे रही थी तो स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह जैसे नेताओं ने भाजपा छोड़ दी, इससे भाजपा में जो भगदड़ मची उसे मद्देनज़र रखते सिंह और शर्मा के टिकट भी कटते-कटते रह गए। वैसे भी पार्टी रणनीतिकारों ने हालिया दिनों में ये नैरेटिव देने की कोशिश की है कि यूपी में ’प्योर पीपुल बनाम करप्ट’ के बीच लड़ाई है और भाजपा बतौर राजनैतिक प्योर पीपुल (राजनैतिक शुचिता के पक्षधरों) की वकालत करती है, जो राजनीति में ऐसे लो-प्रोफाइल चेहरों को मौका देती है जिनके दामन पर किसी प्रकार का कोई दाग न लगा हो।

अपनी इमेज मेकओवर में जुटा है संघ

देश के सबसे बड़े सामाजिक संगठनों में शुमार होने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब अपनी इमेज मेकओवर में जुटा है। पिछले दिनों गुजरात के कर्णावती में जब संघ की प्रतिनिधि सभा की बैठक आहूत हुई तो माना जाता है कि इस बैठक के दो सर्व प्रमुख एजेंडे उभर कर सामने आए। एक तो संघ 2025 में सौ साल का होने जा रहा है, इस परिप्रेक्ष्य में देशभर में अलग-अलग कार्यक्रम की रूपरेखा तय करने पर चर्चा हुई। दूसरा संघ अपना गांव-गांव तक विस्तार चाहता है, सो संघ प्रमुख ने अपने स्वयंसेवकों से खुल कर आह्वान किया कि अब संघ की शाखाएं गांव-गांव में लगनी चाहिए, इसी कड़ी में संघ के बड़े नेताओं ने इस बात पर भी रोशनी डाली कि संघ को अपनी बंधी-बंधाई छवि से भी बाहर निकलना होगा ताकि यह आज के यूथ में अपनी पैठ जमा सके। इसके तहत संघ के चेहरे-मोहरे को और उदार, तार्किक और समीचीन बनाने की भी बात हुई। संघ नेताओं ने माना कि संघ पर शुरू से यह आरोप लगता रहा है कि ये ब्राह्मणवादी और ब्राह्मणवादी वर्चस्व और सोच से प्रेरित संगठन है। इस बंधी-बंधाई अवधारणा को झुठलाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में संघ के अंदर गैर ब्राह्मण नेताओं को ज्यादा तरजीह दी जा रही है। इस कड़ी में एक नेता छत्तीसगढ़ की कम्हार या प्रजापति जाति से आते हैं, जिनका नाम है रामदत्त चक्रधर। चक्रधर पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं, छत्तीसगढ़ में पहले इन्हें सह प्रांत प्रचारक का जिम्मा मिला था, फिर ये वहां प्रांत प्रचारक बने। इसके बाद इन्होंने मध्य क्षेत्र के प्रचारक का दायित्व निभाया। बाद में ये बिहार-झारखंड के क्षेत्र प्रचारक  बनाए गए। रामदत्त चक्रधर ने संघ को साइकिल से मोटर साइकिल पर पहुंचाया और जब देश में संचार क्रांति का सूत्रपात हुआ तो उन्होंने संघ के चेहरे-मोहरे को मॉडर्न बनाने के लिहाज से इसकी कार्यप्रणाली को मोबाइल, कंप्यूटर और लैपटॉप से जोड़ा। संघ के शीर्ष नेतृत्व ने भी एक अभिनव प्रयोग करते चक्रधर को पिछले साल क्षेत्रीय प्रचारक से सीधे सह सरकार्यवाह बना दिया या अपनी तरह का यह पहला उदाहरण है जब संघ में किसी क्षेत्रीय प्रचारक को सीधे सह सरकार्यवाह बनने का मौका मिला हो। आने वाले दिनों में संघ के अंदर कई और गैर ब्राह्मण नेताओं को महती जिम्मेदारी देने की तैयारी है।

पंजाब में अटकी है आप की जान

ढोल-नगाड़ों के शोर और लोगों की उम्मीदों के उफान पर सवारी गांठते आम आदमी पार्टी की सरकार पंजाब में काबिज हुई है। पर सत्ता में आते ही आप को खाली खजाने का भय सताने लगा है। पिछले दिनों पंजाब के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री भगवंत मान ने पीएम मोदी से दो वर्षों के लिए प्रति वर्ष 50 हजार करोड़ रुपए की दर से वित्तीय पैकेज की डिमांड की है। मान का कहना है कि पंजाब सरकार 3 लाख करोड़ रुपयों के कर्ज में पहले से डूबी हुई है। सरकार का सलाना बजट लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपयों का है। आप ने अपने लोकलुभावन चुनावी वादों में जनता से फ्री बिजली (300 यूनिट तक) और 18 वर्ष की आयु वर्ग से ऊपर की हर महिला को उसके खाते में एक हजार रुपए प्रतिमाह देने की घोषणा की थी। पंजाब में ऐसी योग्य महिलाओं की संख्या एक करोड़ के आसपास है यानी आप सरकार को केवल इस मद में प्रतिमाह एक हजार करोड़ रूपए चाहिए होंगे। पार्टी ने राज्य में 16 हजार मोहल्ला क्लीनिक खोलने का भी वादा किया है, बच्चों की निःशुल्क शिक्षा का भी वादा है। 35 लाख घरों को नियमित और फ्री बिजली एक असाध्य कार्य है। वैसे भी राज्य के कुल बजट का 20 फीसदी तो केवल कर्ज पर ब्याज देने में ही चला जाता है। 3 करोड़ की आबादी वाले पंजाब में हर व्यक्ति पर पहले से एक लाख रुपए का कर्ज है, जो पिछली सरकारों की बदौलत है। मान अब मोंटेक सिंह अहूलवालिया के उन सुझावों पर अमल कर हैं, जो सुझाव मोंटेक ने पूर्ववर्ती अमरिंदर सरकार को दिए थे। अब पंजाब के विधायकों को सिर्फ एक ही टर्म की पेंशन मिलेगी, चाहे उसने कितनी बार भी चुनाव जीता हो (यहां बहुत से विधायकों को हारने के बाद भी 3.50-5 लाख रुपयों की पेंशन मिल रही है) अब इस पेंशन की रकम घट कर मात्र 75 हजार रूपए रह जाएगी। केजरीवाल की मुफ्त योजनाओं को अमलीजामा पहनाने का काम अभी राघव चड्डा देख रहे हैं, जिन्हें पार्टी ने अभी-अभी राज्यसभा से नवाज़ा है।

क्या महाराष्ट्र में भी टलेंगे बीएमसी चुनाव?

महाराष्ट्र में भी वृहन मुंबई महानगर पालिका के चुनाव टलने की कगार पर हैं। सूत्र बताते हैं कि बीएमसी के चुनाव को भी अक्टूबर-नवंबर तक टाला जा सकता है। सनद रहे कि बीएमसी के मेयर का कार्यकाल 7 मार्च को ही खत्म हो गया। पहली बार नियमों में बदलाव कर बीएमसी में एक प्रशासक लाया गया है, इकबाल सिंह चहल को यह जिम्मेदारी मिली है, जो बीएमसी का कार्यभार बतौर प्रशासक महानगरपालिका के नए कार्यकाल की पहली सभा तक संभालेंगे। चुनाव टालने की वजह कोरोना और फिर जनगणना को बताया जा रहा है। पर जानकार इसमें भी राजनीति ढूंढ रहे हैं। बीएमसी में सबसे ज्यादा असर षिवसेना और भाजपा का है, इन दोनों दलों के बीच अभी कुट्टी चल रही है। अपने सगे-संबंधियों पर धड़ाधड़ पड़ रहे ईडी के छापों को लेकर उद्धव केंद्र सरकार से बेतरह नाराज़ हैं, केंद्र को इंतजार है कि उद्धव का गुस्सा ठंडा हो तो भाजपा-शिवसेना के दरम्यान नए गठबंधन के स्वरूप पर फिर से बात हो और महाराष्ट्र में फिर से भाजपा-शिवसेना की सरकार हो और बीएमसी का चुनाव भी दोनों दल मिल कर लड़े। बीएमसी चुनाव में कांग्रेस या एनसीपी के साथ जाने का शिवसेना को कोई फायदा नहीं, क्योंकि एनसीपी का जो भी आधार है वह मुंबई से बाहर है। कांग्रेस के साथ जाने से सेना को कोई फायदा नहीं, क्योंकि उसे वैसे भी मुसलमानों के वोट नहीं मिलेंगे। सो, उसे फायदा या तो अकेले चुनाव में जाने से है, या फिर भाजपा से गठजोड़ कर चुनावी मैदान में उतरने से। यह फैसला उद्धव को लेना है, भाजपा फिलहाल उद्धव की हर राह मुश्किल बनाने में जुटी है जिससे कि वे सरेंडर की मुद्रा में आ जाएं। पर फिलहाल यह होता नहीं दिख रहा।

क्या बिहार में उलटफेर होगा?

जदयू नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने योगी आदित्यनाथ के शपथ ग्रहण समारोह में लखनऊ आकर कुछ इस अंदाज में 45 डिग्री पर झुक कर पीएम मोदी का स्टेज पर अभिवादन किया कि राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी राजद बेसाख्ता बोल पड़ी-’अब बस मिट्टी में लेट कर पैर पकड़ना ही बाकी बचा है।’ इस तंज के राजनैतिक माएने हैं। दरअसल जब से वीआईपी पार्टी के तीनों विधायकों ने भाजपा ज्वॉइन कर ली है राज्य में बीजेपी 77 विधायकों के साथ सबसे बड़ी पार्टी में शुमार हो गई है। इसके बाद राजद का नंबर आता है जिसके 75 विधायक हैं और नीतीश के जदयू के मात्र 45 विधायक रह गए हैं। यहां सरकार बनाने के लिए 122 विधायकों का जरूरी बहुमत चाहिए। यानी नीतीश की कुर्सी फिलवक्त केवल भाजपा की मेहरबानी पर टिकी है, पर भाजपा ने अगर नीतीश को ज्यादा आंखें दिखाई तो वे तेजस्वी से भी हाथ मिला सकते हैं। पर राष्ट्रपति चुनाव के बाद बिहार में बड़ा फेरबदल हो सकता है, एक विकल्प तो यह है कि नीतीश देश के राष्ट्रपति बन जाएं और अपनी पार्टी का विलय भाजपा में कर दें। अगर ऐसा नहीं होता है तो भाजपा नीतीश से समर्थन वापिस लेकर खुद सरकार बनाने का दावा कर सकती है, क्योंकि राज्य में वह सबसे बड़ी पार्टी है। राज्यपाल भी उन्हें सरकार बनाने के लिए एक सप्ताह का वक्त दे सकते हैं। भाजपा बहुमत साबित नहीं कर पाई तो राज्य मध्यावधि चुनाव की ओर जा सकता है। अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की और नीतीश सरकार की पूर्व में 7 दिन की सरकार इस बात की गवाह है कि ऐसे कदम किसी भी दल के लिए नए द्वार खोल देते हैं, यानी मुमकिन है कि मध्यावधि चुनाव में भाजपा अपने दम पर बहुमत ले आए।

और अंत में

पंजाब फतह के बाद आम आदमी पार्टी की नज़रें गुजरात चुनाव पर टिकी हैं, वह हरियाणा और हिमाचल में भी अपना पूरा दम लगाना चाहती है। सूत्रों की मानें तो आप अप्रैल माह में गुजरात में अपने आईटी विशेषज्ञों की एक बड़ी टीम अहमदाबाद भेज रही है, यह भाजपा के डिजिटल और सोशल मीडिया टीम को कड़ी चुनौती दे सकती है। भाजपा तो आधा चुनाव अपने सोशल मीडिया टीम से ही जीतने का माद्दा रखती है, यह बात आम आदमी पार्टी के समझ में पहले ही आ चुकी है, जाने कांग्रेस इस बात का संज्ञान कब लेगी।

(त्रिदीब रमण-न्यूज ट्रस्ट ऑफ इंडिया)

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