समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 21 जुलाई: संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत में राजनीतिक रंग विशेष रूप से दिखाई दिया जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और वरिष्ठ सांसद अवधेश प्रसाद एक साथ लोकसभा में उपस्थित हुए। december 2024 में की गई सीटिंग व्यवस्था की पुनर्संयोजना ने इस रवैये को और गहराई दी, जिससे पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) राजनीति का स्पष्ट संदेश गया।
इस्तीफा-सीटिंग व्यवस्था: संकेतों की भाषा
लोकसभा के शीतकालीन सत्र में भाजपा प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में कांग्रेस और सपा समेत इंडिया ब्लॉक की सीटों का आवंटन हुआ। उस दौरान, अवधेश प्रसाद की सीट अचानक दूसरी पंक्ति में बदल दी गई। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस को सहयोगी दलों – विशेषकर सपा – को प्राथमिकता देनी थी, जिससे सपा को केवल एक अग्रिम पंक्ति की सीट प्राप्त हुई। यह निर्णय अखिलेश यादव की नाराजगी का कारण बना।
अब मॉनसून सत्र में दोनों नेता फिर से एक साथ दिखाई दिए, जैसे वे बदलाव के खिलाफ एकजुटता और समर्थन का संकेत दे रहे हों।
पीडीए राजनीति की पृष्ठभूमि और संदेश
इस बार सहभागी राजनीतिक पीडीए – पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक – समूह की राजनीति अधिक स्पष्ट हुई। लोकसभा में दोनों सांसदों के साथ-साथ अन्य पीडीए समर्थक सांसदों की उपस्थिति ने संकेत दिया कि सपा अपनी पहचान और प्रभाव बनाए रखना चाहती है। सीटिंग व्यवस्था में बदलाव ने उनके खिलाफ संदेश भेजने का प्रयास किया, लेकिन इस सार्वजनिक एकजुटता ने पार्टी की रणनीति को सशक्त रूप से पेश किया।
पीएम मोदी का मधुर आह्वान
सत्र से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष को संसद को सुचारू रूप से चलाने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि राजनीति में दल हित हो सकते हैं, लेकिन देशनियत को प्राथमिकता देना आवश्यक है। उन्होंने “ऑपरेशन सिंदूर” का उल्लेख करते हुए कहा कि विपक्षी दलों को इस मामले में एक स्वर में मौजूदगी दिखानी चाहिए।
मंत्री मोदी ने कहा, “दल हित में मत भले ही न मिले लेकिन देशहित में मन जरूर मिलना चाहिए।” उन्होंने कई नए विधेयकों की भी घोषणा की, जिन्हें वे संसद द्वारा पारित कराना चाहते हैं
राजनीतिक रणनीति और आगामी चुनाव
इस सक्रिय राजनीतिक दृश्य का संबंध आगामी राज्य और विधानसभा चुनावों से भी है। अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से पीडीए वोट बैंक पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं, और सीटिंग व्यवस्था में वरिष्ठ नेताओं की वापसी उनके लिए राजनीतिक सशक्तिकरण का संकेत है।
विधायी एवं लोकसभा चुनावों में यह बयान सामने आया है कि सपा पुनः भारत की पीडीए राजनीति की धुरी बनने की ओर अग्रसर है।
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