बिहार में गठबंधन के लिए बेताब AIMIM, लालू-तेजस्वी ने दिखाया ठंडा रुख

समग्र समाचार सेवा
पटना, 12 सितंबर: बिहार की सियासत इन दिनों एक नए मोड़ पर है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) किसी भी कीमत पर भारत गठबंधन (INDIA Bloc) का हिस्सा बनने को बेताब है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान लगातार राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव से अपील कर रहे हैं कि AIMIM को महागठबंधन में शामिल किया जाए। यहां तक कि वे गुरुवार को अपने समर्थकों के साथ पटना स्थित लालू यादव के आवास तक पहुँच गए, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

ईमान का कहना है कि AIMIM सिर्फ़ छह सीटों की मांग कर रही है और उनकी कोशिश है कि विपक्षी दल मिलकर चुनाव लड़ें ताकि “सांप्रदायिक ताकतों” को सत्ता में आने से रोका जा सके। उनका तर्क है कि अगर AIMIM को साथ नहीं लिया गया तो वोट बंट जाएंगे और भाजपा को सीधा फायदा होगा।

AIMIM की गुहार और विपक्ष का ठंडा रुख

लालू यादव के आवास पर प्रदर्शन के दौरान AIMIM समर्थक नारे लगाते दिखे—“लालू-तेजस्वी अपने कान खोल, तेरे दरवाजे पर बज रहा है ढोल।” इसके बावजूद न तो लालू यादव ने दरवाजा खोला और न ही महागठबंधन ने AIMIM को कोई आश्वासन दिया। राजद और कांग्रेस दोनों ही पार्टी को साथ लेने के खिलाफ नजर आ रहे हैं।

राजद सांसद मनोज झा पहले ही साफ कर चुके हैं कि अगर ओवैसी सचमुच भाजपा को रोकना चाहते हैं, तो उन्हें खुद चुनाव लड़ने के बजाय महागठबंधन का समर्थन करना चाहिए। कांग्रेस भी AIMIM को लेकर उत्साहित नहीं है और इसे गठबंधन का हिस्सा बनाने से बच रही है।

AIMIM की मजबूरी और बेचैनी

ओवैसी की पार्टी का असली आधार बिहार के सीमांचल क्षेत्र की कुछ सीटों तक सीमित है। लेकिन इस बार का चुनाव साफ तौर पर एनडीए और INDIA Bloc के बीच सिमटता नजर आ रहा है। ऐसे में AIMIM की राजनीतिक संभावनाएँ धूमिल होती दिख रही हैं।

इसके अलावा, राहुल गांधी की “वोट अधिकार यात्रा” और तेजस्वी यादव का वक्फ कानून पर रुख मुस्लिम वोटरों को महागठबंधन की ओर खींच रहा है। यही वजह है कि AIMIM गठबंधन में जगह पाने के लिए बार-बार कोशिश कर रही है।

ओवैसी से परहेज क्यों कर रहा है गठबंधन?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी की छवि कट्टर मुस्लिम नेता की है। अगर राजद या कांग्रेस उनके साथ हाथ मिलाते हैं तो भाजपा उन्हें मुस्लिम समर्थक और “कट्टरपंथी” पार्टी का साथी बताकर हिंदू वोटरों को एकजुट करने की कोशिश करेगी। इस तरह मुस्लिम वोट तो AIMIM के साथ आ सकते हैं, लेकिन हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण एनडीए के पक्ष में होगा।

यही वजह है कि लालू और तेजस्वी फिलहाल ओवैसी से दूरी बनाए हुए हैं। उनके लिए AIMIM को साथ लेने से फायदा कम और राजनीतिक नुकसान ज्यादा है।

बिहार में AIMIM की बेचैनी साफ है। ओवैसी गठबंधन में शामिल होकर न सिर्फ अपनी सीटों को सुरक्षित करना चाहते हैं बल्कि भाजपा की “बी-टीम” वाली छवि से भी छुटकारा पाना चाहते हैं। मगर लालू और तेजस्वी की रणनीति फिलहाल AIMIM को दरकिनार कर भारत गठबंधन को एकजुट रखने की है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि AIMIM अकेले लड़ती है या किसी और दल के सहारे राजनीति की जमीन तलाशती है।

 

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