अमित शाह का पीहला जवाबः ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में तीन आतंकी ढेर, निर्दोषों की धर्म पूछकर हत्या की दोषसंगत चर्चा
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 29 जुलाई: लोकसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के सन्दर्भ में बेहद संवेदनशील बयान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि आतंकी हमले में निर्दोष नागरिकों की हत्या उनके धर्म पूछकर की गई, जिसे उन्होंने कड़ी निंदा की। शाह ने प्रभावित परिवारों के प्रति अपनी गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए बताया कि जम्मू-कश्मीर पुलिस, भारतीय सेना और CRPF के संयुक्त अभियान ‘ऑपरेशन महादेव’ में पहलगाम हमले के तीन मुख्य साजिशकर्ताओं—सुलेमान उर्फ फैजल, अफगान और जिबरान—को ढेर कर दिया गया।
गंभीर अपराधियों का सफाया, न्याय और सुरक्षा का संदेश
शाह ने बताया कि सुलेमान लश्कर-ए-तैयबा का A-श्रेणी कमांडर था। अफगान और जिबरान भी उसी संगठन के उच्च श्रेणी के आतंकी थे, जिन्होंने बैसरन घाटी में निर्दोष नागरिकों पर हमला किया था। इस अभियान में उनकी राइफलें जब्त की गईं और फॉरेंसिक रिपोर्ट से उनकी पहचान की पुष्टि संभव हुई। यह संदेश स्पष्ट करता है कि भारत की सुरक्षा संरचना आतंकवाद से प्रभावी रूप से निपटने में सक्षम है।
विपक्ष पर तंज, असामंजस्य की आशंका
घर मंत्री ने कांग्रेस समेत विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया पर कटाक्ष करते हुए पूछा कि क्या जब आतंकवादियों के मारे जाने की खबर मिली, तब विपक्ष चिंतित था या संतुष्ट नहीं? उन्होंने कहा कि उन्होंने प्रभावित परिवारों से कहा था कि ऐसी त्रासदियों को रोकने के लिए राजनीतिक मंचों पर संवेदनशील रुख रखना बेहद जरूरी है।
अमित शाह ने विशेष रुप से एक हादसे की कथा साझा की, जिसमें पति की मृत्यु के सिर्फ 6 दिनों बाद एक महिला शोक में डूबी रही। यह विवरण संसद में उपस्थित सभी को भावुक कर गया।
आदालत और NIA का सहयोग
उन्होंने यह भी बताया कि ऑपरेशन के पहले, NIA ने उनके सहयोगियों की गिरफ्तारी कर ली थी। जब आतंकियों की शव दिल्ली एयरलिफ्ट कर श्रीनगर पहुँचे, तो वहां उनकी पहचान इन तीन हमलावरों के रूप में हुई। यह स्पष्ट करता है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियां आतंकवाद के सभी पहलुओं—साजिश, आर्थिक सहायता, स्थल संबंधी जानकारी—पर लगातार नजर रखती हैं।
ऑपरेशन सिंदूर पर अमित शाह का बयान भावनात्मक, संवेदनशील और निर्णायक है। इस दौरान उन्होंने न केवल आतंकवाद के खिलाफ भारत के निर्णयात्मक रवैये की पुष्टि की, बल्कि निर्दोष नागरिकों को धर्म पूछकर मारने वाली घोर नीतियों की कड़े शब्दों में निंदा की। विपक्ष की प्रतिक्रिया पर उनके तंज ने स्पष्ट संकेत दिया कि ऐसे हमलों पर राजनीतिक सहानुभूति से अधिक नैतिक एकजुटता ज़रूरी होती है।
इस बहस ने दर्शा दिया कि लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों को जिम्मेदारी के साथ राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी चाहिए—विशेषकर जब मसला आतंकवाद, जनता की सुरक्षा और संवेदनशील सवालों का हो।
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