समग्र समाचार सेवा
टोक्यो/नई दिल्ली, 30 अगस्त: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर शुक्रवार को जापान पहुंचे, जहां जापान के प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। मोदी ने पारंपरिक जापानी अभिवादन “अरिगातो गोजाइमासु” कहकर इशिबा का अभिनंदन किया। यह शब्द जापान में शिष्टाचार और आदर व्यक्त करने के लिए प्रयुक्त होता है और इसका अर्थ है “बहुत-बहुत धन्यवाद।”
सांस्कृतिक मेलजोल और भारतीय रंग
टोक्यो में भारतीय समुदाय ने प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत पारंपरिक विधियों से किया। गायत्री मंत्र और वैदिक श्लोकों के सामूहिक पाठ के साथ यह कार्यक्रम भारत और जापान की सांस्कृतिक साझेदारी का प्रतीक बना।
इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को शोरिनजान दारुमा-जी मंदिर के मुख्य पुजारी रेव सेशी हिरोसे ने एक पारंपरिक दारुमा गुड़िया भेंट की। यह लाल रंग की खोखली और गोल आकृति जापान में शुभता और धैर्य का प्रतीक मानी जाती है। दिलचस्प बात यह है कि दारुमा गुड़िया भारतीय भिक्षु और जेन बौद्ध धर्म के संस्थापक बोधिधर्म से जुड़ी मानी जाती है, जिससे भारत-जापान की साझा आध्यात्मिक जड़ों का भी संदेश मिलता है।
आर्थिक साझेदारी में नई ऊंचाई
भारत और जापान के बीच 15वें वार्षिक शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों नेताओं ने व्यापार, निवेश, रक्षा, प्रौद्योगिकी और बुनियादी ढांचे जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा की।
जापानी प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा ने ऐलान किया कि जापान आने वाले पांच वर्षों में भारत में 10 ट्रिलियन येन (लगभग 67 अरब अमेरिकी डॉलर) से अधिक का निवेश करेगा। यह निवेश न केवल औद्योगिक उत्पादन को गति देगा बल्कि भारत में रोजगार सृजन और आधारभूत ढांचे को भी मज़बूत करेगा।
रक्षा और तकनीकी सहयोग पर जोर
रक्षा क्षेत्र में दोनों देशों ने आपसी सहयोग को और गहरा करने का फैसला किया। संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ाने, रक्षा तकनीक साझा करने और रक्षा उत्पादन में साझेदारी को प्राथमिकता देने पर सहमति बनी। विशेषज्ञों का मानना है कि यह सहयोग हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिहाज़ से बेहद अहम है।
इसके अलावा, तकनीकी सहयोग में भारत की डिजिटल ताकत और जापान की उच्च तकनीक का संगम दोनों देशों को वैश्विक तकनीकी क्रांति का अगुवा बना सकता है। स्टार्टअप, सेमीकंडक्टर और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में नए अवसर खुलने की उम्मीद जताई गई।
प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा केवल कूटनीतिक या आर्थिक महत्व की नहीं बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी ऐतिहासिक है। दारुमा गुड़िया का उपहार और अरिगातो गोजाइमासु का संबोधन इस बात का प्रतीक है कि भारत और जापान का रिश्ता केवल नीतियों पर नहीं बल्कि दिलों और संस्कृतियों के साझा धागों पर भी आधारित है।
आने वाले समय में यह साझेदारी एशिया और दुनिया दोनों के लिए स्थिरता और विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.