समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 28 अगस्त: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने बुधवार को कहा कि समाज और व्यक्ति के जीवन में संतुलन ही धर्म है, जो हर प्रकार के अतिवाद से बचाता है। भारतीय परंपरा में इसे मध्य मार्ग कहा गया है और यही आज की दुनिया की सबसे बड़ी ज़रूरत है।
विज्ञान भवन, दिल्ली में संघ के शताब्दी वर्ष पर आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला के दूसरे दिन “100 वर्षों की यात्रा: नए क्षितिज” विषय पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि वैश्विक आदर्श बनने के लिए बदलाव की शुरुआत घर से होनी चाहिए। इसके लिए संघ ने पंच परिवर्तन (Five-fold Transformations) का अभियान शुरू किया है— सामाजिक समरसता, परिवार जागरण, पर्यावरण जागरूकता, आत्मनिर्भरता व सांस्कृतिक गौरव और नागरिक कर्तव्य।
आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी का आह्वान
भागवत ने कहा, “भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए स्वदेशी को प्राथमिकता देनी होगी। हमारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार हमारी शर्तों पर होना चाहिए, किसी दबाव में नहीं।” उन्होंने जोर दिया कि भारत हमेशा संयमित रहा है और यहां तक कि शत्रुओं की मदद भी संकट के समय की है।
संघ का कार्य और जीवन मूल्य
संघ की कार्यशैली पर उन्होंने स्पष्ट किया कि सेवा और निस्वार्थ भाव ही उसका आधार हैं। swayamsevaks बिना किसी स्वार्थ या प्रलोभन के सामाजिक कार्य में आनंद पाते हैं। भागवत ने कहा कि जीवन का उद्देश्य और मुक्ति समाज सेवा से ही संभव है।
उन्होंने संघ के जीवन मूल्यों को बताते हुए कहा – अच्छे लोगों से मित्रता करना, दुष्टों की उपेक्षा करना, किसी के अच्छे कार्य पर प्रसन्नता व्यक्त करना और दुष्टों पर भी करुणा दिखाना।
हिंदुत्व और विश्व कल्याण
भागवत ने हिंदुत्व को परिभाषित करते हुए कहा, “हिंदुत्व सत्य, प्रेम और अपनत्व की भावना है।” ऋषि-मुनियों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जीवन केवल अपने लिए नहीं है, बल्कि “विश्व कल्याण” के लिए है।
उन्होंने कहा कि दुनिया इस समय धार्मिक अतिवाद, संघर्ष और असंतुलन की ओर बढ़ रही है। पिछले 350 वर्षों में भौतिकवाद और उपभोक्तावाद ने मानव जीवन के मूल्यों को कमजोर किया है।
महात्मा गांधी के सात सामाजिक पापों का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि “बिना मेहनत का काम, बिना विवेक का सुख, बिना चरित्र का ज्ञान, बिना नैतिकता का व्यापार, बिना मानवता का विज्ञान, बिना त्याग का धर्म और बिना सिद्धांत की राजनीति—यही समाज को खोखला बनाती हैं।”
धर्म का वैश्विक संदेश
भागवत ने कहा कि धर्म किसी कर्मकांड तक सीमित नहीं है। धर्म का अर्थ है अनुशासित और संतुलित जीवन जीना। यही विश्व धर्म है, जिसमें विविधताओं का सम्मान और सभी के अस्तित्व को स्वीकार करने की बात है। उन्होंने जोर दिया कि हिंदू समाज को एकजुट होकर दुनिया के सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए।
पंच परिवर्तन और सामाजिक समरसता
भागवत ने कहा कि बदलाव की शुरुआत घर से होनी चाहिए। इसके लिए संघ ने पांच क्षेत्रों में काम शुरू किया है— त्योहारों पर पारंपरिक वस्त्र पहनना, मातृभाषा में हस्ताक्षर करना, स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देना, परिवार और समाज में संवाद बढ़ाना और पर्यावरण संतुलन को बनाए रखना।
उन्होंने कहा कि “आज आवश्यकता फांसी के फंदे पर चढ़ने की नहीं, बल्कि 24 घंटे राष्ट्र के लिए जीने की है।” उकसावे में आकर अवैध कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि असामाजिक तत्व ऐसे अवसरों का लाभ उठाते हैं।
संघ का बढ़ता प्रभाव
भागवत ने कहा कि आज समाज में संघ की विश्वसनीयता बढ़ी है। “जब संघ बोलता है, तो समाज सुनता है।” उन्होंने कहा कि यह भरोसा सेवा और समर्पण से अर्जित किया गया है।
संघ का अगला लक्ष्य समाज के हर वर्ग, जाति और क्षेत्र तक पहुंच बनाना है। संघ शाखाओं के माध्यम से सकारात्मक शक्तियों को जोड़कर चरित्र निर्माण और राष्ट्रहित का कार्य आगे बढ़ाएगा।
अपने संबोधन के अंत में भागवत ने कहा कि संघ किसी श्रेय का आकांक्षी नहीं है। संघ चाहता है कि भारत ऐसा उन्नत राष्ट्र बने, जो न केवल स्वयं को परिवर्तित करे, बल्कि पूरी दुनिया को शांति और सुख की राह दिखाए।
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