बांग्लादेशी भी इंसान हैं’ बयान पर असम में सियासी भूचाल, CM सरमा बोले– जिन्ना के सपनों को साकार करने की कोशिश
समग्र समाचार सेवा
गुवाहाटी, 28 अगस्त: असम में बांग्लादेशी घुसपैठ और नागरिकता का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व योजना आयोग की सदस्य सैयदा हमीद के हालिया बयान – “बांग्लादेशी भी इंसान हैं, वे यहां रह सकते हैं” – ने राज्य की राजनीति को गर्मा दिया है। इस टिप्पणी ने न केवल असम की सांस्कृतिक पहचान और जनसंख्या संतुलन को लेकर चिंता बढ़ाई है, बल्कि राज्य के कई संगठनों और नेताओं को तीखी प्रतिक्रिया देने पर मजबूर किया है।
मुख्यमंत्री का कड़ा रुख
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हमीद के बयान को अस्वीकार्य करार देते हुए इसे “जिन्ना के सपनों को साकार करने की कोशिश” बताया। सरमा ने कहा कि असम अपनी भूमि और संस्कृति की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाएगा। उन्होंने लाचित बरफुकन के संघर्ष का जिक्र करते हुए कहा कि असम की पहचान के साथ खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
असम जातीय परिषद (AJP) और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने भी हमीद की टिप्पणी को असम आंदोलन और उसमें दिए गए बलिदानों का अपमान बताया।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
कांग्रेस नेता देबरत सैकिया ने इस विवाद को केंद्र और राज्य सरकारों की नीतिगत विफलता से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में किए गए वादों के अनुसार बांग्लादेशी घुसपैठियों को वापस भेजने का वादा पूरा किया होता, तो आज असम को इस संकट से नहीं जूझना पड़ता।
इस बीच, असम नागरिक सम्मेलन (ANS) ने स्पष्ट किया कि हमीद का बयान उनके संगठन का आधिकारिक रुख नहीं है। ANS ने कहा कि वे अब भी 1985 के असम समझौते की पवित्रता में विश्वास रखते हैं और 25 मार्च 1971 के बाद आए सभी बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान और निर्वासन की मांग करते हैं।
असम समझौते का संदर्भ
बांग्लादेशी प्रवास का मुद्दा असम में नया नहीं है। 1971 के युद्ध और उसके बाद बड़ी संख्या में शरणार्थियों के आने से यहां जनसांख्यिकीय संतुलन बिगड़ने की आशंका पैदा हुई। इसी के खिलाफ असम आंदोलन (1979-1985) चला, जो अंततः 1985 के असम समझौते के रूप में सामने आया। इस समझौते में 24 मार्च 1971 को नागरिकता की अंतिम सीमा तय की गई थी, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन की कमी ने आज भी विवाद को जिंदा रखा है।
हमीद का विवादित बयान
सैयदा हमीद ने असम को “राक्षसों की धरती” कहकर भी नया विवाद खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि असम में मुसलमानों पर अत्याचार हो रहे हैं और ‘मियां’ शब्द, जो कभी सम्मानजनक था, अब गाली बन चुका है। उन्होंने बांग्लादेशियों का समर्थन करते हुए कहा – “बांग्लादेशी होना क्या गलत है? बांग्लादेशी भी इंसान हैं।”
व्यापक दृष्टिकोण
यह विवाद एक बार फिर साबित करता है कि असम में बांग्लादेशी प्रवास का प्रश्न केवल नागरिकता का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, सुरक्षा और राजनीतिक अस्तित्व का भी है। जहां एक ओर मानवीय संवेदनाओं और मानवाधिकार की दलीलें दी जाती हैं, वहीं दूसरी ओर असमिया समाज अपनी जनसांख्यिकीय संरचना और ऐतिहासिक समझौतों की रक्षा को लेकर मुखर है।
इसलिए असम में इस विषय पर की गई कोई भी टिप्पणी राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील मानी जाती है।
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