भोपाल मास्टर प्लान 2047 खामियों से भरा: अभय दुबे
कांग्रेस प्रवक्ता अभय दुबे ने भोपाल विकास योजना 2047 के नए प्रारूप पर उठाई लिखित आपत्ति, कानूनी विसंगतियों और हरित क्षेत्र की कमी पर घेरा।
- अभय दुबे ने भोपाल विकास योजना 2047 पर जताई कड़ी लिखित आपत्ति।
- 21 वर्षों से बिना किसी वैध मास्टर प्लान के चल रहा है भोपाल शहर।
- नए प्रारूप को बताया वाहनों पर केंद्रित, हरित क्षेत्र मानक से काफी कम।
समग्र समाचार सेवा
भोपाल, 26 अक्तूबर: मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के सुव्यवस्थित और भविष्यगामी विकास को लेकर तैयार की गई ‘भोपाल विकास योजना 2047’ (प्रारूप) विवादों के घेरे में आ गई है। कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अभय दुबे ने इस नए मास्टर प्लान प्रारूप पर विस्तृत कानूनी और नीतिगत आपत्तियां दर्ज कराई हैं। यह लिखित आपत्ति मध्य प्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 की धारा 18 के तहत नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के संयुक्त संचालक के समक्ष प्रस्तुत की गई है। अभय दुबे ने आरोप लगाया है कि नया प्रारूप न केवल गंभीर कानूनी खामियों से भरा हुआ है, बल्कि यह आम नागरिकों और सार्वजनिक परिवहन के बजाय केवल निजी वाहनों की आवाजाही को बढ़ावा देने वाला योजनागत दस्तावेज है।
21 सालों से अवधि-पार योजना के भरोसे भोपाल का विकास
पत्रकारों से चर्चा करते हुए अभय दुबे ने कहा कि भोपाल की पिछली स्वीकृत विकास योजना वर्ष 2005 में ही समाप्त हो चुकी थी। जनवरी 2006 से लेकर अब तक, यानी पिछले 21 वर्षों से मध्य प्रदेश की राजधानी एक अवधि-पार हो चुकी (Expired) योजना के भरोसे चल रही है।
उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2019-20 में कांग्रेस सरकार ने अपने 15 महीनों के कार्यकाल के दौरान ‘विकास योजना 2031’ का प्रारूप पूरी पारदर्शिता के साथ प्रकाशित किया था। उस समय अधिनियम की धारा 18 और 19(1), (2), (3) के तहत आवश्यक कानूनी प्रक्रियाएं पूरी की जा चुकी थीं और आम नागरिकों व विशेषज्ञों की 3,000 से अधिक आपत्तियों पर सुनवाई भी संपन्न हो गई थी। केवल अंतिम अधिसूचना जारी होना बाकी था, परंतु भाजपा सरकार ने सत्ता में आते ही उस योजना को गैर-कानूनी ढंग से निरस्त कर दिया। इतने वर्षों तक योजना लागू न होना भोपाल के सुनियोजित विकास को भ्रष्टाचार और अव्यवस्था की भेंट चढ़ाने जैसा है।
मास्टर प्लान में पाई गईं मुख्य कानूनी विसंगतियां
अभय दुबे ने अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों का हवाला देते हुए नए प्रारूप की निम्नलिखित कानूनी खामियों को रेखांकित किया:
धारा 15 का उल्लंघन: राजपत्र में वर्ष 2024 के वर्तमान भूमि उपयोग मानचित्र का उल्लेख तो है, लेकिन इसका न तो आधिकारिक प्रकाशन किया गया, न ही जनता से आपत्तियां मांगी गईं और न ही इसे विधिवत अंगीकृत किया गया।
धारा 17(ट) की अनदेखी: वर्ष 2020 में किए गए संशोधन के तहत नगर विकास स्कीमों की अनंतिम सीमाओं (Provisional Boundaries) को मानचित्र पर दर्शाना अनिवार्य है। प्रारूप में इन सीमाओं को छिपाया गया है, जिससे मनमाने नीतिगत निर्णयों और भ्रष्टाचार की गुंजाइश बनती है।
धारा 34 का विलोपन (2017): इस धारा के विलोपन से उन निजी भूमि स्वामियों के पास कानूनी उपचार का कोई साधन नहीं बचा है जिनकी भूमि आरक्षित की जाती है। मांग की गई है कि निजी भूमि पर आरक्षण न्यूनतम हो और भू-स्वामियों को TDR (ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स) या लैंड पूलिंग के जरिए उचित क्षतिपूर्ति मिले।
जल निकायों का संरक्षण: भोपाल के केवल बड़े तालाब के जलग्रहण क्षेत्र (Catchment Area) को शामिल किया गया है, जबकि शहर के सभी 18 जल निकायों के जलग्रहण क्षेत्रों को अधिसूचित कर उनके संरक्षण की विस्तृत योजना बननी चाहिए।
हरित क्षेत्र का पारदर्शी तुलनात्मक ब्योरा: वर्ष 2005 की योजना के ग्रीन बेल्ट में किए गए बदलावों का पूरा विवरण पारदर्शी तरीके से प्रकाशित किया जाए।
योजना की बुनियादी और इंफ्रास्ट्रक्चर संबंधी कमियां
कांग्रेस प्रवक्ता ने बताया कि 45 लाख की संभावित आबादी के लिए बनाई गई यह योजना जनता की जरूरतों को नजरअंदाज करती है:
सार्वजनिक परिवहन की उपेक्षा: भोपाल में 54% दैनिक यात्राएं पैदल, साइकिल या ऑटो से होती हैं। फिर भी योजना में सार्वजनिक परिवहन, समर्पित बस लेन, साइकिल ट्रैक या वॉक-वे के लिए कोई स्पष्ट लक्ष्य या नक्शा शामिल नहीं है।
अव्यावहारिक TOD और ग्रोथ कॉरिडोर: मेट्रो के दोनों ओर 500 मीटर का क्षेत्र (लगभग 9,500 हेक्टेयर) TOD (ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट) घोषित है, लेकिन FAR, सस्ते आवास और पार्किंग जैसे मूल नियम टाल दिए गए हैं। वहीं 51 किमी लंबे बायपास के दोनों ओर 300-300 मीटर में सघन विकास प्रस्तावित है जो कार-निर्भर रिबन विकास को बढ़ावा देगा और बाहरी बायपास को ही एक भीड़भाड़ वाली शहर की सड़क में तब्दील कर देगा।
URDPFI मानकों से विचलन: योजना में आवासीय भूमि मानक से 5-7% अधिक है, जबकि घनत्व मानक से 28-48% कम रखा गया है। शहर का दायरा 601 से बढ़ाकर 1,017 वर्ग किमी करने के बावजूद व्यावसायिक, औद्योगिक और परिवहन भूमि मानक से कम है। 4.8 लाख झुग्गीवासियों के लिए EWS/LIG आवास हेतु कोई भूमि आरक्षित नहीं की गई है।
पर्याप्त हरित क्षेत्र का अभाव: URDPFI मानकों के अनुसार प्रति व्यक्ति 10-12 वर्ग मीटर खुला स्थान चाहिए (कुल 4,500-5,400 हेक्टेयर)। परंतु योजना में बगीचे और लेक फ्रंट मिलाकर मात्र 3,153 हेक्टेयर (लगभग 7 वर्ग मीटर प्रति व्यक्ति) हैं, जो मानक से 1,350 से 2,250 हेक्टेयर कम है। कुल 24% हरित क्षेत्र केवल कागजों पर शहर के बाहरी सिटी फॉरेस्ट (9,208 हेक्टेयर) को जोड़कर दिखाया जा रहा है।
जल आपूर्ति व बुनियादी ढांचा: 2047 के बजाय केवल 2031 तक के पानी का अनुमान दिया गया है, जिसमें 45 लाख आबादी के लिए 209 MLD (31%) पानी की कमी है। STP, WTP और पावर सब-स्टेशन के लिए जमीन चिन्हित नहीं है और शहर के फैलाव पर आने वाले ₹59,000 करोड़ के खर्च का कोई वित्तीय प्लान नहीं है।
मांग और निष्कर्ष
अभय दुबे ने मांग की है कि धारा 15 के तहत अद्यतन भूमि उपयोग मानचित्र को विधिवत अंगीकृत कर संशोधित प्रारूप पुनः प्रकाशित किया जाए। योजना में सार्वजनिक परिवहन के लक्ष्य, URDPFI के अनुरूप भूमि उपयोग, सस्ते आवास, 2047 तक की जल योजना और मजबूत वित्तीय रूपरेखा शामिल की जाए, ताकि भोपाल को एक टिकाऊ और जनहितकारी मास्टर प्लान मिल सके।
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