समग्र समाचार सेवा
मुंबई, 21 जुलाई: 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों में 189 लोगों की जान गई और 800 से अधिक घायल हुए। साल 2015 में सत्र न्यायालय ने कुल 13 आरोपियों में से 12 को दोषी ठहराया था। लेकिन अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने बड़ी राहत भरी रिहाई का फैसला करते हुए 11 दोषियों को निष्पक्ष अधिवेशन और सम्मानित प्रक्रिया की कमी के आधार पर बरी कर दिया है।
2006: साजिश से अंजाम—एक सुनियोजित आतंक
2006 में यह आतंकवादी हमले भारत में बर्बरता की नियोजित साजिश थे। मार्च में लश्कर-ए-तैयबा, सिमी और पाकिस्तानी आतंकी एकजुट हुए और बहावलपुर में योजना बनाई। मई में प्रशिक्षित आतंकवादियों को भारत भेजा गया, फिर जून में स्थानीय सीमा के रास्ते सक्रियता व विस्फोट की तैयार की गई। 11 जुलाई को सात समूहों में बंटकर, प्रेशर कुकर बम ट्रेनों में रखे गए।
गोपनीय तैयारियाँ: हूँद-भर तकनीकी
गोवंडी में मोहम्मद अली के फ्लैट में कुकर बम बनाए गए। प्रत्येक में 2–2.5 किग्रा RDX व 3.5–4 किग्रा अमोनियम नाइट्रेट भरा। आतंकवादी अख़बार की रैक्सीन बैग में छिपा कर चर्चगेट स्टेशन ले गए और प्लेटफॉर्म से ट्रेन में चढ़े। भीड़ के कारण एक बम प्लान फेल हो गया, जिसमें हमलावर मारा गया
2015 की सजा, हालिया हाईकोर्ट की बरी
सत्र न्यायालय ने 2015 में 12 आरोपियों को दोषी ठहराया था। लेकिन बॉम्बे उच्च न्यायालय ने अदालत की साक्ष्य-औपचारिकता और रीति-नियमों की अनदेखी की वजह से 11 आरोपियों को बेदाग बताया। बरी फैसले में कहा गया कि न्यायिक प्रक्रिया में पर्याप्त सावधानी नहीं ली गई, जिससे दोष सिद्ध नहीं किया जा सका
समय की सच्चाई—क्या हुआ न्याय?
12 वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद यह फैसला फरियादियों की न्याय प्रक्रिया की समीक्षा और अदालतों की जिम्मेदारी पर सवाल उठाता है। पीड़ितों और न्याय खोज रहे परिवारों के लिए यह एक मिश्रित राहत है, लेकिन देश में एंटी-टेरर कानूनों की जांच, साक्ष्य संग्रहण और न्यायिक प्रक्रिया की चुनौतियों पर नए विमर्श को जन्म देता है।
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