नव ठाकुरीया
बांग्लादेश सरकार ने हाल ही में दक्षिण एशियाई देश के दक्षिणी हिस्से में अशांत चट्टोग्राम हिल ट्रैक्ट्स (सीएचटी) की लंबे समय से चली आ रही चुनौतियों से निपटने के लिए तीन हाई-लेवल कमेटियों का पुनर्गठन किया है। हालांकि, बांग्लादेशी बुद्धिजीवियों और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों के एक बड़े समूह ने इन पहलों का विरोध करते हुए कहा है कि इससे केवल सैन्यीकरण बढ़ेगा और पहाड़ी इलाकों के मूल निवासियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन की घटनाएं बढ़ेंगी।
एक संयुक्त बयान में समूह ने कहा कि ढाका को इस क्षेत्र में नौकरशाही शासन स्थापित करने के किसी भी नए प्रयास से बचना चाहिए। यह क्षेत्र भारत के पूर्वोत्तर राज्यों त्रिपुरा और मिजोरम के साथ-साथ पश्चिमी म्यांमार के रखाइन (अराकान) राज्य की सीमा से लगा है। समूह ने इसके बजाय सभी संबंधित पक्षों के साथ राजनीतिक चर्चा के माध्यम से हर तरह के संकट को हल करने की पहल करने की मांग की है।
गौरतलब है कि ढाका में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने 10 सितंबर 2026 को सीएचटी पर तीन कमेटियों के गठन की घोषणा करते हुए तीन गजट नोटिफिकेशन जारी किए। प्रधानमंत्री रहमान की अध्यक्षता वाली सीएचटी मामलों की राष्ट्रीय समिति को इस अविकसित क्षेत्र के लिए प्राथमिकता वाली नीतियां तय करने का काम सौंपा गया है।
19 सदस्यों वाली इस समिति में नौ मंत्री भी शामिल हैं। इसे विभिन्न सरकारी एजेंसियों के साथ समन्वय करने और सीएचटी के लिए राष्ट्रीय रणनीति को अंतिम रूप देने का अधिकार दिया गया है। अन्य दो कमेटियां—सीएचटी मामलों की कार्यकारी समिति और सीएचटी मामलों की सलाहकार समिति—सीएचटी में समग्र विकास, आतंकवाद-रोधी उपायों, सीमा सुरक्षा और सांप्रदायिक सद्भाव पर नीतियों की सिफारिश करने के लिए जिम्मेदार होंगी।
यह भी उल्लेखनीय है कि भारत के विभाजन के समय 97 प्रतिशत से अधिक गैर-मुस्लिम आबादी वाले चट्टोग्राम पहाड़ी इलाकों को पूर्वी पाकिस्तान में शामिल किया गया था। बाद में 1960 के दशक में कपताई जलविद्युत बांध के निर्माण के कारण बड़ी संख्या में पहाड़ी परिवारों को विस्थापित होना पड़ा।
विभिन्न एजेंसियों का अनुमान है कि इस परियोजना के कारण कम से कम एक लाख लोगों को बेदखल किया गया और उनमें से कई त्रिपुरा सीमा के रास्ते भारत में आ गए। जब 1971 में मुस्लिम बहुल पीपल्स रिपब्लिक ऑफ बांग्लादेश का गठन हुआ, तो चट्टोग्राम के आदिवासी नेताओं ने ढाका सरकार से स्वायत्तता की मांग की, लेकिन इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया गया।
चटगांव के स्थानीय लोगों की मुश्किलें और बढ़ गईं, जब चार लाख से ज्यादा बेजमीन बंगाली मुसलमानों को सीएचटी में बसाया गया और उनकी सुरक्षा के लिए एक लाख से ज्यादा बांग्लादेशी सैनिक भी भेजे गए। आबादी के बदलते स्वरूप ने—जहां बंगाली मुस्लिम बसने वालों की संख्या मूल आदिवासी आबादी (लगभग 49 प्रतिशत) से ज्यादा हो गई—पहाड़ी लोगों को ढाका में अधिकारियों के खिलाफ आंदोलन करने के लिए मजबूर कर दिया।
हालांकि शुरुआत लोकतांत्रिक तरीकों से हुई थी, लेकिन ‘पर्वत्य चट्टग्राम जन संहति समिति’ के नेतृत्व में चल रहा यह आंदोलन जल्द ही हिंसक हो गया। बांग्लादेश के राष्ट्रपति जियाउर रहमान और बाद में तानाशाह हुसैन मोहम्मद इरशाद ने बातचीत के जरिए इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश की, लेकिन उनकी कोशिशें कामयाब नहीं हुईं।
बांग्लादेश अवामी लीग की नेता हसीना ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान लंबे समय से चल रहे सशस्त्र संघर्षों को खत्म करने के मकसद से 2 दिसंबर 1997 को सीएचटी समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। लेकिन विडंबना यह है कि अवामी लीग ने बार-बार वादे करने के बावजूद शांति समझौते को लागू करने के लिए जरूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई।
2009 में दोबारा सत्ता में आने के बाद हसीना ने सीएचटी में गैर-मुस्लिम परिवारों को धोखा देने के लिए वही हथकंडे अपनाए। बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हसीना अक्सर सीएचटी समझौते को एक सफलता की कहानी के तौर पर पेश करती थीं और उन्हें दक्षिणी बांग्लादेश क्षेत्र में शांति लाने की पहल के लिए नोबेल शांति पुरस्कार मिलने की उम्मीद भी थी। हालांकि उन्हें यह सम्मान नहीं मिला, लेकिन सीएचटी संकट को सुलझाने के उनके प्रयासों के लिए उन्हें 2009 का इंदिरा गांधी शांति पुरस्कार दिया गया।
बाद में माइक्रो-फाइनेंस बैंकर डॉ. मुहम्मद यूनुस को 2006 का नोबेल शांति पुरस्कार बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक के साथ संयुक्त रूप से दिया गया, जिससे हसीना नाराज हो गईं। समय के साथ दोनों के बीच व्यक्तिगत दुश्मनी बढ़ गई, जो उनके सार्वजनिक बयानों और यहां तक कि कार्यों में भी दिखाई दी।
जुलाई-अगस्त 2024 में बड़े पैमाने पर जन-विद्रोह के बाद हसीना के ढाका से भागने पर प्रो. यूनुस ने अंतरिम सरकार के प्रमुख के तौर पर जिम्मेदारी संभाली, लेकिन उन्होंने भी सीएचटी के मुद्दों के प्रति वैसी ही लापरवाही दिखाई।
राष्ट्रीय चुनाव के बाद 17 फरवरी 2026 को बनी बीएनपी सरकार ने सीएचटी समझौते को लागू करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। गौरतलब है कि सत्ताधारी बीएनपी और जातीय संसद में मुख्य विपक्षी दल जमात-ए-इस्लामी, दोनों ने ही कभी इस समझौते का विरोध किया था।
बांग्लादेश की कुल आबादी, जो 17 करोड़ से ज्यादा है, का लगभग एक प्रतिशत हिस्सा पहाड़ी परिवारों का है। ये परिवार मुख्य रूप से बौद्ध धर्म के साथ-साथ हिंदू, ईसाई और एनिमिज्म (प्रकृति-पूजा) को मानते हैं।
कई सदियों पहले तिब्बत, भारत और म्यांमार से आकर बसे इन जातीय समूहों में चकमा, मारमा, संताल, म्रो, तंचंग्या, बॉम, त्रिपुरी, खासी, खुमी, कुकी, गारो, बिष्णुप्रिया मणिपुरी आदि शामिल हैं। हालांकि वे बड़े स्तर पर बातचीत के लिए आमतौर पर बंगाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में वे अभी भी अपनी बोलियों को संजोए हुए हैं।
सीएचटी समझौते पर हस्ताक्षर होने के लगभग तीन दशक बाद भी इस इलाके में शांति नहीं आ पाई है। भले ही इस समझौते ने दो दशक से चल रहे सशस्त्र संघर्ष को औपचारिक रूप से खत्म कर दिया, लेकिन पहाड़ियों, जिन्हें जुम्मा लोग भी कहा जाता है, को न्याय, सार्थक स्वायत्तता और जमीन के अधिकार देने का वादा अभी भी पूरा नहीं हुआ है।
सीएचटी में भारी सैन्यीकरण, जमीन से जुड़े अनसुलझे विवाद, कमजोर नागरिक संस्थाएं और लगातार हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान खींचते रहे हैं। भारत और म्यांमार की संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पास होने के कारण सीएचटी में अशांति से पूरे इलाके में—जिसमें बंगाल की खाड़ी का क्षेत्र भी शामिल है—नकारात्मक असर पड़ने की बड़ी आशंका बनी रहती है।
लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार और दक्षिण एशियाई देशों के मामलों के स्तंभकार हैं
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