संविधान संशोधन बिल पर सियासी तूफ़ान: नैतिक राजनीति या विपक्ष पर वार?

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 22 अगस्त: बुधवार (20 अगस्त, 2025) को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में 130वां संविधान संशोधन विधेयक समेत तीन अहम बिल पेश किए, जिन्हें अब संयुक्त समिति के पास भेजा जा चुका है। राज्यसभा में भी 21 अगस्त को यही प्रक्रिया दोहराई गई। इन विधेयकों ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है, क्योंकि इनके कानून बनने की स्थिति में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्री तक अपनी कुर्सी से हाथ धो सकते हैं—सिर्फ “गंभीर आरोपों” के आधार पर।

सरकार का दावा है कि यह बिल राजनीति में नैतिकता की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। लेकिन विपक्ष इसे “लोकतंत्र पर कुठाराघात” और “राजनीतिक प्रतिशोध का हथियार” बता रहा है। सवाल यही है—क्या यह बिल वाकई भ्रष्टाचार पर लगाम लगाएगा या फिर विपक्ष को निशाने पर लेने का साधन बनेगा?

बिल में क्या है प्रावधान?

विधेयक के मुताबिक:

  • यदि कोई मंत्री 30 दिन से अधिक समय तक किसी अपराध के आरोप में हिरासत में रहता है और अपराध की सज़ा 5 वर्ष या उससे अधिक हो सकती है, तो राष्ट्रपति उसे पद से हटा देंगे।
  • प्रधानमंत्री के लिए भी यही नियम लागू होगा—31वें दिन तक इस्तीफा देना होगा, अन्यथा पद स्वतः समाप्त माना जाएगा।
  • यही प्रावधान मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों पर भी लागू होंगे।

यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री को किसी सरकारी एजेंसी द्वारा गिरफ़्तार किया जा सकता है? शायद नहीं। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि यह कानून केवल विपक्ष के नेताओं पर लागू होगा।

विपक्ष की आशंका क्यों?

इतिहास बताता है कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल अक्सर विपक्ष के खिलाफ होता रहा है।

  • सितंबर 2022 की इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट में कहा गया कि 2014 के बाद ईडी की कार्रवाई चार गुना बढ़ी और 95% मामले विपक्षी नेताओं पर दर्ज हुए।
  • अप्रैल 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, 25 विपक्षी नेता भाजपा में शामिल होने के बाद एजेंसियों से राहत पा गए। इनमें से 23 नेताओं को जांच से छुटकारा मिला और 3 मामलों को पूरी तरह बंद कर दिया गया।

इससे विपक्ष का आरोप मजबूत होता है कि “नैतिक राजनीति” का यह बिल सत्ता का हथियार है।

सत्येंद्र जैन का केस और बिल का असर

दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन के खिलाफ 2019 में एफआईआर दर्ज हुई थी। सीबीआई ने 5 साल की जांच के बाद अगस्त 2025 में क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल की और अदालत ने साफ कहा कि “कोई साज़िश या भ्रष्टाचार नहीं मिला।”

अगर यह नया कानून तब लागू होता, तो सिर्फ आरोप और हिरासत के आधार पर ही जैन को पद से हटाया जा सकता था—भले ही बाद में अदालत ने उन्हें निर्दोष पाया। यही बिंदु विपक्ष के लिए सबसे बड़ी चिंता है।

भाजपा का नैतिकता बनाम विपक्ष का पलटवार

भाजपा कहती है कि यह बिल राजनीति में नैतिक आचरण की बहाली है, ताकि दागी नेता सत्ता में न रह सकें। लेकिन विपक्ष का पलटवार है कि भाजपा खुद दागी नेताओं को अपने पाले में शामिल कर “नैतिकता” की परिभाषा बदल देती है।

सवाल वाजिब है—अगर सच में नैतिकता की चिंता है तो क्या भाजपा अपने उन नेताओं पर भी यही प्रावधान लागू करेगी, जिन पर गंभीर आरोप हैं? या यह कानून सिर्फ विपक्षी नेताओं के लिए है?

130वां संविधान संशोधन विधेयक देश की राजनीति में गेम-चेंजर साबित हो सकता है। लेकिन इसके स्वरूप और अतीत के अनुभवों को देखते हुए आशंका भी है कि यह लोकतंत्र में “लेवल प्लेइंग फील्ड” को और कमजोर कर देगा। राजनीति में नैतिकता लाने का दावा तभी विश्वसनीय होगा जब यह बिल सत्ता और विपक्ष दोनों पर समान रूप से लागू हो। वरना यह लोकतंत्र में एकतरफा प्रहार बनकर रह जाएगा।

 

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