दिल्ली में CJP नेताओं को रिहाई, एक वर्ष तक शांति भंग न करने की शर्त

 समग्र समाचार सेवा
 नई दिल्ली  11 अक्टूबर :दिल्ली के कार्यकारी मजिस्ट्रेट न्यायालय ने CJP के तीन नेताओं—अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका—को रिहा करने का आदेश दिया है। रिहाई इस शर्त पर दी गई है कि तीनों अगले एक वर्ष तक शांति भंग करने वाली किसी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे। LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार तीनों नेताओं को निवारक हिरासत में लिया गया था और उन्हें दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट, दिल्ली कैंट पुलिस स्टेशन के समक्ष पेश किया गया था।

विमान से उतरते ही लिया गया था हिरासत में

रिपोर्ट के अनुसार तीनों CJP नेता शनिवार को दिल्ली पहुंचे थे और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन में शामिल होने वाले थे। दिल्ली पुलिस ने उन्हें विमान से उतरने के तुरंत बाद हिरासत में ले लिया था।

उनके अधिवक्ता सौतिक बनर्जी ने रिहाई के बाद कहा कि तीनों को मुक्त कर दिया गया है और वे अब वहां से जा सकते हैं। CJP की लीगल अफेयर्स प्रमुख रत्ना सिंह ने भी उनकी रिहाई की पुष्टि की।

BNSS की धारा 126 और 170 के तहत कार्रवाई

तीनों नेताओं के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 170 लागू की गई थी।

धारा 126 के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट किसी ऐसे व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बांड भरने को कह सकता है जिसके बारे में आशंका हो कि वह शांति भंग कर सकता है या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित कर सकता है। यह अवधि अधिकतम एक वर्ष तक हो सकती है।

वहीं धारा 170 पुलिस को यह अधिकार देती है कि यदि उसे यह आशंका हो कि कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराध करने वाला है और उस अपराध को किसी अन्य तरीके से रोका नहीं जा सकता, तो उसे बिना वारंट गिरफ्तार किया जा सकता है। ऐसी हिरासत सामान्यतः 24 घंटे तक सीमित रहती है, जब तक कि किसी अन्य कानूनी प्रावधान के तहत आगे की अनुमति न मिले।

राजधानी में बड़े पैमाने पर हिरासत

दिल्ली पुलिस के अनुसार शनिवार को राजधानी भर में करीब 2,500 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। इसके अतिरिक्त प्रदर्शन से पहले रातभर चलाए गए निवारक अभियान में लगभग 1,000 लोगों को पहले ही हिरासत में लिया गया था।

इन कार्रवाइयों के बाद हिरासत की वैधानिकता और सार्वजनिक परिवहन पर लगाए गए व्यापक प्रतिबंधों को लेकर न्यायिक चुनौती सामने आई है।

सुप्रीम कोर्ट में भी विशेष सुनवाई

इसी पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट आज विशेष बैठक कर उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है जिनमें राजनीतिक नेताओं, पूर्व मुख्यमंत्रियों, छात्रों, युवाओं, पत्रकारों, वकीलों और अन्य लोगों की कथित व्यापक हिरासत को चुनौती दी गई है।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक अवमानना याचिका भी सूचीबद्ध है, जिसमें रेल और मेट्रो सहित सार्वजनिक परिवहन सेवाओं के कथित व्यापक बंद को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इन प्रतिबंधों का उद्देश्य प्रदर्शनकारियों को राजधानी पहुंचने से रोकना था। इन आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी सामने नहीं आया है।

रत्ना सिंह की याचिका पहले हुई थी खारिज

एक दिन पहले दिल्ली की एक अदालत ने CJP की लीगल अफेयर्स प्रमुख रत्ना सिंह की वह याचिका खारिज कर दी थी जिसमें उन्होंने अपनी कथित अवैध हिरासत को लेकर पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने और तत्काल रिहाई की मांग की थी।

क्यों महत्वपूर्ण है मामला

यह पूरा मामला केवल तीन राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हिरासत और रिहाई तक सीमित नहीं है। यह निवारक हिरासत की वैधानिक सीमा, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की प्रशासनिक जिम्मेदारी और न्यायिक निगरानी जैसे व्यापक संवैधानिक प्रश्नों से जुड़ा हुआ है।

दिल्ली के कार्यकारी मजिस्ट्रेट का ताजा आदेश फिलहाल तीनों CJP नेताओं को राहत देता है, लेकिन उनके सामने एक वर्ष तक शांति बनाए रखने की शर्त रखी गई है।

अब ध्यान सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई पर है, जहां व्यापक हिरासत और सार्वजनिक परिवहन प्रतिबंधों की वैधानिकता पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां सामने आ सकती हैं।

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