मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन मामला
नेहा बोरा को दिल्ली हाईकोर्ट से झटका, शांति बॉन्ड नोटिस के विरुद्ध याचिका खारिज
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दिल्ली हाईकोर्ट ने नेहा बोरा की शांति बॉन्ड नोटिस को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की।
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पुलिस ने 16 अक्टूबर को मंडी हाउस में विरोध प्रदर्शन के दौरान बोरा को हिरासत में लिया था।
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अदालत ने माना कि मजिस्ट्रेट की कार्रवाई केवल सुनी-सुनाई जानकारी पर आधारित नहीं थी।
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पुलिस को संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने और मजिस्ट्रेट को निष्पक्ष प्रक्रिया सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 24 अक्टूबर : दिल्ली हाईकोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामले में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को बड़ा कानूनी झटका दिया है। न्यायालय ने शांति बनाए रखने के लिए 10,000 रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड और एक जमानतदार प्रस्तुत करने संबंधी नोटिस को चुनौती देने वाली उनकी याचिका 23 अक्टूबर को खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध थी। हालांकि, अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि आगे की कार्यवाही में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन हो।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन से जुड़ा मामला
मामले की शुरुआत 16 अक्टूबर को हुई, जब नेहा बोरा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के तहत मंडी हाउस में लोगों को एकत्र होने का आह्वान किया था। प्रदर्शनकारियों की योजना कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में राष्ट्रीय ध्वज फहराने की भी थी।
पुलिस ने बोरा को हिरासत में लिया था। इसके बाद 17 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 126 और 130 के तहत नोटिस जारी किया।
नोटिस में सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका के आधार पर 10,000 रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड और एक जमानतदार प्रस्तुत करने का कारण बताने को कहा गया था।
हाईकोर्ट ने पुलिस रिकॉर्ड को माना महत्वपूर्ण
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि मजिस्ट्रेट के समक्ष विभिन्न पुलिस थानों में दर्ज तीन जनरल डायरी प्रविष्टियां और 17 अक्टूबर की पुलिस रिपोर्ट सहित प्रासंगिक सामग्री उपलब्ध थी।
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि मंडी हाउस क्षेत्र में BNSS की धारा 163 के अंतर्गत निषेधाज्ञा लागू थी।
अदालत के अनुसार, शांति भंग होने की आशंका से संबंधित निवारक कार्रवाई शुरू करने के लिए मजिस्ट्रेट को विस्तृत आपराधिक मुकदमे जैसी जांच करना आवश्यक नहीं है। हालांकि, अंतिम आदेश से पहले कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।
नेहा बोरा की ओर से क्या दलील दी गई?
नेहा बोरा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण था और उनकी मुवक्किल ने किसी प्रकार की हिंसा का आह्वान नहीं किया था।
उन्होंने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि आवश्यक प्रारंभिक जांच किए बिना अंतरिम शांति बॉन्ड की मांग करना उचित नहीं था।
दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि मजिस्ट्रेट के पास पर्याप्त जानकारी थी और नोटिस कानूनी प्रावधानों के अनुरूप जारी किया गया था।
शांतिपूर्ण विरोध और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन
इस फैसले ने लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासनिक अधिकारों के इस्तेमाल के बीच संतुलन के प्रश्न को फिर सामने रखा है।
न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि बोरा को नोटिस से संबंधित सामग्री उपलब्ध कराई जानी चाहिए और मजिस्ट्रेट को कोई अंतिम आदेश देने से पहले उनका पक्ष सुनना होगा।
यह फैसला नेहा बोरा को किसी अपराध में दोषी ठहराने का निर्णय नहीं है, बल्कि शांति भंग होने की आशंका के आधार पर शुरू की गई निवारक कार्यवाही की वैधता से संबंधित है।
इस निर्णय का महत्वपूर्ण संदेश है कि लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रयोग के साथ कानून द्वारा निर्धारित सार्वजनिक व्यवस्था और निष्पक्ष प्रक्रिया, दोनों का सम्मान आवश्यक है ।
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