- माइक्रो ऑब्जर्वर को मतदाता सूची बदलने का अधिकार नहीं।
- ममता बनर्जी ने बंगाल को निशाना बनाए जाने का आरोप लगाया।
- एक करोड़ से अधिक मतदाताओं से अतिरिक्त दस्तावेज माँगे गए।
- आंगनवाड़ी रजिस्टर को वैध प्रमाण नहीं माना गया।
समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली ,9 फरवरी : पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठे विवाद पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि माइक्रो ऑब्जर्वर को किसी भी मतदाता का नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार नहीं है। यह संवैधानिक और कानूनी अधिकार केवल संबंधित विधानसभा क्षेत्र के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) और सहायक ERO के पास ही है।
यह विवाद तब गहराया जब राज्य के एक करोड़ से अधिक मतदाताओं से नागरिकता सहित अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए। तृणमूल कांग्रेस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने अदालत में यह भी कहा कि करीब 8,100 केंद्रीय कर्मचारियों और PSU अधिकारियों को माइक्रो ऑब्जर्वर बनाकर तैनात करना राज्य के मतदाताओं पर अनावश्यक दबाव बनाने जैसा है। उनका तर्क है कि जिन अन्य राज्यों में SIR चल रहा है, वहां इतनी बड़ी संख्या में केंद्रीय अधिकारी नहीं भेजे गए।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि माइक्रो ऑब्जर्वर राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के प्रशासनिक नियंत्रण में काम कर रहे हैं। उनका दायरा केवल जमीनी स्तर पर प्रक्रियाओं को सुचारू बनाना है, जैसे यह देखना कि दस्तावेज सही ढंग से एकत्र किए जा रहे हैं या नहीं। आयोग ने साफ कहा कि माइक्रो ऑब्जर्वर किसी भी मतदाता की पात्रता पर निर्णय नहीं लेते।
आयोग ने यह भी बताया कि राज्य सरकार की ओर से पर्याप्त कर्मियों की उपलब्धता न होने के कारण केंद्रीय अधिकारियों की तैनाती करनी पड़ी। इस बयान से केंद्र और राज्य सरकार के बीच पहले से जारी राजनीतिक टकराव और तेज होने की संभावना है। वहीं, सामाजिक संगठनों ने चेतावनी दी है कि बार-बार दस्तावेज मांगने से प्रवासी मजदूरों, बुजुर्गों और गरीब तबके के मतदाताओं को सबसे अधिक परेशानी हो रही है।
एक और अहम मुद्दे पर चुनाव आयोग ने कहा कि आंगनवाड़ी केंद्रों में रखे जाने वाले पारिवारिक रजिस्टर SIR प्रक्रिया में वैध दस्तावेज नहीं माने जा सकते। इससे ग्रामीण इलाकों के हजारों परिवारों पर सीधा असर पड़ सकता है।
अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से यह तय होगा कि मतदाता सत्यापन की यह प्रक्रिया आगे किस दिशा में जाएगी और इसका आने वाले चुनावों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
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