
कुमार राकेश
उत्तराखंड राजनीतिक भाग्य व दुर्भाग्य के बीच छटपटा रहा है. जब से यह राज्य बना,परेशानी,तनाव और आपाधापी के बीच परेशान हैं .छटपटा रहा है.भ्रमित हैं.बेबस हैं. उसका मूल कारण है- राजनीतिक अस्थिरता. कहते हैं अस्थिरता से विकास प्रभावित होता है.वही उत्तराखंड में हुआ.इस वजह से यहाँ की जनता को न तो समग्र शांति मिली, न ही समग्र विकास.इसलिए राजनीतिक अस्थिरता की वजह से विकास के लिए छटपटा रहा है देवभूमि उत्तराखंड .
जो भी मुख्यमंत्री बने या बनाये गए.ज्यादातर पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो कुछ पर अपने दलों का असहयोग.उस असहयोग की वजह में असहयोग करने वालो का निहित स्वार्थ के कारण ज्यादा रहे,जन आकांक्षा से जुड़े मुद्दे कम देखे गए.
मजे में रही नौकरशाही.वो कल भी मजे में थे,आज भी मजे में हैं .कहते हैं सामान्य तौर पर नौकरशाही को स्वयं का विकास ज्यादा रुचिकर होता हैं.उसके बाद कोई प्राथमिकता होती हैं.परन्तु कुछ नौकरशाह अच्छे भी होते हैं कि वे सेवा भाव से राजनीति में आ जाते हैं. या सम्बन्धित दलों द्वारा बुला लिए जाते हैं .ऐसे कई उदाहरण हैं.
उत्तराखंड का सृजन भाजपा काल में सन 2000 में किया गया था.वो अटल बिहारी वाजपेयी का नेतृत्व काल था.परन्तु सरकार से संगठन पर लालकृष्ण आडवाणी का दबदबा था.केंद्र सरकार द्वारा पहला नाम उत्तराचल रखा गया था.बाद में कई संघर्ष गाथाओं के बाद उसे उत्तराखंड का नया नाम दिया गया.
भारत में छोटे राज्यों की अपनी व्यथायें है.अपनी अपनी कथाएं हैं .हर्ष व विषाद की कई कहानियाँ हैं.शासन व कुशासन के कई किस्से हैं.उत्तराखंड भी उन छोटे राज्यों में से एक हैं.यह राज्य गठन के 21 वर्ष में हैं.9 नवम्बर 2020 को 20 साल पूरे हुए.इसे एक शाप ही कहा जायेगा कि इन 20 वर्षो में इस राज्य में अब तक 8 मुख्यमंत्री हुए हैं.5 भाजपा के तो 3 कांग्रेस के .वैसे भाजपा के त्रिवेन्द्र सिंह रावत के बाद भाजपा से ही नए मुख्यमंत्री 9 वें मुख्यमंत्री होंगे.लेफ्टिनेंट जनरल भुवन चन्द्र खंडूरी भाजपा के ऐसे नेता रहे, जिन्हें दो दो बार मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला.उनका दोनों कार्यकाल काफी साफ सुथरा रहा.सिवाय अपने दलों के कई नेताओ के असहयोग के.त्रिवेन्द्र रावत के साथ भी ऐसा कुछ हुआ है.इन पर भी ऐसा कोई आरोप नहीं लगा हैं.जैसा कि रमेश पोखरियाल निशंक के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे थे.
श्री रावत भाजपा के पहले मुख्यमंत्री हैं,जो सबसे लम्बे कार्यकाल करीब 4 वर्षो तक मुख्यमंत्री रहे.18 मार्च 2021 को वो चार साल पूरा जाते.जिसमे 9 दिन शेष बचे थे.जिसका जिक्र उन्होंने 9 मार्च को अपने अंतिम प्रेस कांफ्रेंस में भी किया.ये उनका दर्द ही कहा जायेगा कि उनके केन्द्रीय नेतृत्व ने उन्हें 9 दिनों की मोहलत भी नहीं दिया.शेष सभी नेताओ को ज्यादा से ज्यादा 2 वर्षो का कार्यकाल ही मिल सका था.वैसे तकनीकी तौर पर राज्य में 13 बार सत्ता परिवर्तन हुए.जिसमे त्रिवेन्द्र सिंह रावत का कार्यकाल भी शामिल हैं.
जब उतराखंड बनाया गया तो भाजपा के कई नामचीन नाम थे पार्टी के पास.लेकिन किसी राजनीतिक अजायब घर से निकाले गए गैर राजनीतिक टाइप के नित्यानंद स्वामी प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बनाये गए.वह ज्यादा दिन तक नहीं चल सके .नहीं चलना था.नौकरशाही ने भी कई ऐसे उपक्रम किये,जिससे उनकी जल्दी विदाई हो गई .श्री स्वामी 9 नवम्बर 2000 से 29 अक्टूबर 2001 तक ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रह सके.उनके बाद प्रदेश के सशक्त नेता भगत सिंह कोशियारी मुख्यमंत्री बनाये गए.परन्तु वह भी जायदा दिनों तक सरकार की गाड़ी को नहीं खींच सके.उनकी सरकार 1 मार्च 2002 को चली गयी.
उनके बाद भाजपा सरकार की विदाई हो गयी.बहुचर्चित कांग्रेस नेता नारायण दत्त तिवारी को प्रदेश की कमान सौंपी गयी.उन्होंने ऐन-केन प्रकारेण 5 वर्षो तक सरकार चलाने में सफल रहे .श्री तिवारी 2 मार्च 2002 से 7 मार्च 2007 तक मुख्यमंत्री बने रहे.आज की तारीख में श्री तिवारी राज्य के अति सौभाग्यशाली मुख्यमंत्री कहे जा सकते हैं.जो लगातार पांच वर्षो तक मुख्यमंत्री बने रहने में कामयाब रहे. उनके बाद फिर भाजपा को राज्य की कमान मिली.केंद्र में मंत्री रहे लेफ्टिनेंट जनरल भुवन चन्द्र खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाया गया.श्री खंडूरी 7 मार्च 2007 से 26 जून 2009 तक मुख्यमंत्री रहे.फिर भाजपा में खींचातनी .अंतर्कलह बढ़ा और पत्रकार से राजनेता बने रमेश पोखरियाल निशंक की लाटरी खुली.वे मुख्यमंत्री बने.27 जून 2009 से 10 सितम्बर 2011 तक ही वह मुख्यमंत्री रह सके.उन पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे.उन्हें कुर्सी छोडनी पड़ी.उनके बाद फिर से श्री खंडूरी को सत्ता सौंपी गयी.क्योकि वो कुर्सी उनसे ही छिन कर रमेश पोखरियाल को दी गयी थी.श्री खंडूरी 13 मार्च 2012 तक मुख्यमंत्री रहे.
उसके बाद फिर से कांग्रेस का राज आया.उस वक़्त कांग्रेस के लोक प्रिय नेता हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनना था.लेकिन कई कारणों से विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाया गया.ये नाटक काफी लम्बा चला था.विजय बहुगुणा 13 मार्च 2012 से ३१ जनवरी 2014 तक मुख्यमंत्री रहे .उनके सीएम रहते हुए देहरादून से दिल्ली तक कई प्रकार के नाटक देखने को मिले.उसके बाद हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया.1 फ़रवरी 2014 को हरीश रावत मुख्यमंत्री बनाये गए.लेकिन उनका दुर्भाग्य या प्रदेश का .वो भी अपना टर्म पूरा नहीं कर पाए .हरीश रावत कुल जमा 3 वर्षो तक मुख्यमंत्री रहे
उसके बाद कई प्रकार के राजनीतिक नाट्य कर्मो के बाद 18 मार्च 2017 को भाजपा से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रहे त्रिवेन्द्र सिंह रावत को नया मुख्यमंत्री बनाया गया था.परन्तु केन्द्रीय नेतृत्व के कुछ ऐतिहासिक गलतियों को त्रिवेन्द्र रावत को झेलना पड़ा.केन्द्रीय नेतृत्व ने 2016-17 के दौरान लीपापोती के क्रम में कांग्रेस के एक धड़े को भाजपा में शामिल करवा दिया था.वो सब सत्ता लोलुपता की वजह से भाजपा में तो शामिल हो गए थे,लेकिन भाजपा संस्कारों को अंगीकार नहीं कर सके .नतीजतन पिछले चार वर्षो तक उत्तराखंड व मुख्यमंत्री श्री रावत को आंतरिक स्तर पर कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था.मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार पैदा हो गए थे.जिनमे हरक सिंह रावत ,सतपाल महाराज,सुबोध उनियाल जैसे नाम शामिल रहे.केन्द्रीय भाजपा स्तर पर सांसद अजय भट्ट और अनिल बलूनी के नाम भी अक्सर चर्चा में रहे .
परन्तु केन्द्रीय नेतृत्व के हिसाब से किसी विधायक को ही मुख्यमंत्री के लिए उपयुक्त माना गया.इसलिए जानकारों के हिसाब से धन सिंह रावत अगले मुख्यमंत्री हो सकते हैं .देखना है कि इस राज्य का भाग्य क्या होगा या ये राज्य ऐसे ही राजनीतिक अस्थिरता का दुर्भाग्य झेलता रहेगा??
उत्तराखंड की राजनीतिक स्थिरता सभी दलों के लिए ,राज्य के प्रबुद्ध जानो के लिए चिंता व चिंतन का कारण होना चाहिए.इसलिए मेरा सबसे सवाल हैं .सभी दलों से सवाल हैं.ऐसा क्यों हो रहा हैं विकास के लिए गठित इन छोटे राज्यों के साथ.क्या ये अन्याय नहीं है? क्या ये उचित है ? इन राजनेताओ के व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओ को राज्य क्यों झेले.क्या किसी से राज्य के विकास रोड के मैप पर अभी तक काम किया हैं? इन कार्यों में राज्य की जनता का भी अधिकार व कर्त्तव्य दोनों बनता है .उन्हें अपने राज्यों के प्रति जाग्रत होना पड़ेगा.
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