गंगा एक्सप्रेसवे: पैसा यूपी का, सड़क ‘सेठ’ की और लूट जनता की!

ज्ञानेन्द्र अवस्थी
मेरठ से प्रयागराज तक बिछाई गई 594 किलोमीटर की यह डामर की पट्टी विकास की राह नहीं, बल्कि आम आदमी की आर्थिक कमर तोड़ने का एक डेथ वारंट’ है। जिसे ‘यूपी की लाइफलाइन’ कहा जा रहा है, वह असल में ‘सेठ’ की तिजोरी भरने का वह पाइपलाइन है जिसमें खून-पसीना आम जनता का बहेगा और मलाई ‘विशेषाधिकार प्राप्त’ ओलिगार्क्स कूटेंगे।

1. टोल नहीं, ‘टैक्स टेररिज्म’ है यह!

ज़रा इन आँकड़ों को देखिये और सोचिये कि क्या यह एक्सप्रेसवे आम भारतीयों के लिए बना है या केवल खास ‘पूँजीपतियों’ के काफिले के लिए?
दोपहिया/तिपहिया वाहन: रुपये 905 (क्या एक दूध बेचने वाला या छोटा किसान इतना टोल दे पाएगा?)
कार (आना-जाना): 3,600 (एक मध्यमवर्गीय परिवार की मासिक बचत का बड़ा हिस्सा एक सफर में साफ!)
ट्रक/बस (आना-जाना): 11,400 (इस लूट का सीधा असर महंगाई पर पड़ेगा, क्योंकि हर सामान की ढुलाई महंगी होगी।)
सवाल: भारत की कितनी प्रतिशत जनता अपनी जेब से 3,600 का टोल चुकाने की हैसियत रखती है? क्या यह एक्सप्रेसवे केवल उन 1% लोगों के लिए है जो ‘राष्ट्र सेठ’ के क्लब का हिस्सा हैं?

2. निवेश का छलावा और बैंक गारंटी का ‘खेल

सत्य तो यह है कि ‘सेठ’ ने अपनी जेब से धेला भी नहीं लगाया है। जनता का पैसा लगा। लूटेगा राष्ट्र सेठ।
कंगाल सेठ, सरकार गवाह: कुल लागत में से मात्र 9,000 करोड़ सेठ ने लगाए हैं, वह भी बैंक लोन के ज़रिए। और कमाल देखिये, उस लोन की ‘बैंक गारंटी’ भी योगी सरकार ने ली है। यानी जोखिम जनता का, गारंटी सरकार की और मुनाफा सेठ का!
25-30 साल की गुलामी: अगले तीन दशकों तक सेठ इस सड़क पर वसूली करेगा। जनता का पैसा, जनता की ज़मीन, सरकार की गारंटी और वसूली का हक सिर्फ एक ‘खास दोस्त’ को?

3. श्वेत पत्र की मांग: दूध का दूध, पानी का पानी हो

योगी सरकार को इस पूरे प्रोजेक्ट पर श्वेत पत्र’ (White Paper) लाना चाहिए। जनता को यह जानने का हक है कि:
* ‘सेठ’ ने वास्तव में अपनी इक्विटी से कितना पैसा लगाया?
* बैंकों से लिए गए लोन की शर्तों में जनता के हितों की बलि क्यों दी गई?
* जब 90% से ज़्यादा वित्तीय जोखिम सरकार का है, तो टोल वसूली का शत-प्रतिशत हक निजी हाथों में क्यों?

4. ओलिगार्की और ‘बरगी’ जैसा पतन

यह वही सोच है जो जबलपुर के बरगी बांध में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाती है और मासूमों की जलसमाधि का कारण बनती है। यह वही मानसिकता है जो 1 लीटर एथेनॉल के लिए 10,000 लीटर पानी फूँक देती है ताकि ‘निखिल गडकरी’ जैसों का टर्नओवर बढ़ सके।
रणनीतिक विफलता: जहाँ चीन तेल भंडार जमा कर रहा है, हम अपने ही संसाधनों को ‘सेठों’ के हवाले कर रहे हैं। हम चीन से मशीनरी आयात कर रहे हैं और अपनी सड़कों को निजी जागीर बना रहे हैं।
दो बेच रहे हैं, दो खरीद रहे हैं… देश नहीं बिकने दूंगा
गंगा एक्सप्रेसवे इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कैसे सार्वजनिक संपत्ति को चंद ‘धनपशुओं’ के हवाले किया जा रहा है। संवैधानिक संस्थाएँ मौन हैं और ‘सहयोग पोर्टल’ जैसी व्यवस्थाएँ इस लूट के खिलाफ उठने वाली आवाज़ को 3 घंटे में ‘डिलीट’ करने के लिए तैयार खड़ी हैं।
आज अगर यूपी की जनता ने इस ‘टोल लूट’ पर सवाल नहीं उठाया, तो अगले 30 साल तक हमारी आने वाली पीढ़ियाँ अपनी ही ज़मीन पर चलने के लिए ‘सेठ’ को लगान चुकाती रहेंगी।
चुनौती खुली है—यह विकास है या विनाश का एक्सप्रेसवे? सरकार जवाब दे!

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