भारत–भूटान व्यापार को ब्रह्मपुत्र जलमार्ग से जोड़ने की पहल

समग्र समाचार सेवा

नई दिल्ली/गुवाहाटी 11 अक्टूबर : भारत और भूटान के बीच क्षेत्रीय व्यापार और संपर्क को मजबूत करने की दिशा में ब्रह्मपुत्र नदी तथा असम के जोगीघोपा टर्मिनल की भूमिका तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही है। दोनों देशों ने राष्ट्रीय जलमार्ग-2 और इससे जुड़े नदी मार्गों का उपयोग कर भूटान को भारत, बांग्लादेश और आगे वैश्विक व्यापारिक नेटवर्क से अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ने की संभावनाओं पर चर्चा की है।

नई दिल्ली में 8 अक्टूबर को आयोजित Sagarmanthan: The Great Oceans Dialogue 2026 के दौरान केंद्रीय बंदरगाह, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने भूटान के बुनियादी ढांचा एवं परिवहन मंत्री ल्योंपो चंद्र बहादुर गुरुंग के साथ द्विपक्षीय बैठक की। इस बातचीत में राष्ट्रीय जलमार्ग-2 और जोगीघोपा टर्मिनल को भूटान के लिए वैश्विक व्यापार का संभावित प्रवेश द्वार बताया गया।

राष्ट्रीय जलमार्ग-2 की केंद्रीय भूमिका

राष्ट्रीय जलमार्ग-2 असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर धुबरी से सादिया तक लगभग 891 किलोमीटर लंबा जलमार्ग है। केंद्र सरकार पिछले कई वर्षों से इसे माल और यात्री परिवहन के लिए विकसित कर रही है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार धुबरी-पांडु खंड में नौवहन योग्य गहराई बनाए रखने, टर्मिनल विकसित करने और रात में नौवहन सुविधाओं के विस्तार जैसे कार्य किए गए हैं।

इस जलमार्ग की खासियत यह है कि यह केवल असम के भीतर परिवहन का साधन नहीं है, बल्कि Indo-Bangladesh Protocol Route के माध्यम से पूर्वोत्तर भारत को कोलकाता और हल्दिया बंदरगाहों तथा आगे समुद्री व्यापार से जोड़ सकता है।

भूटान समुद्र से घिरा हुआ देश नहीं है, इसलिए उसके लिए भारत के नदी और सड़क नेटवर्क के माध्यम से बंदरगाहों तक पहुंच आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

जोगीघोपा टर्मिनल क्यों है महत्वपूर्ण

जोगीघोपा में विकसित इनलैंड वाटरवेज टर्मिनल को फरवरी 2025 में राष्ट्र को समर्पित किया गया था। करीब ₹82 करोड़ की लागत से बने इस टर्मिनल की प्रारंभिक माल ढुलाई क्षमता 1.1 मिलियन टन प्रति वर्ष बताई गई थी। इसे राष्ट्रीय राजमार्ग और बहु-मोडल लॉजिस्टिक्स पार्क से भी जोड़ने की योजना है।

जोगीघोपा की भौगोलिक स्थिति इसे भूटान के लिए खास बनाती है। यह भूटान के गेलेफू क्षेत्र से लगभग 91 किलोमीटर दूर है। भारत सरकार इसे भारत-भूटान-बांग्लादेश के बीच त्रिपक्षीय व्यापार के संभावित केंद्र के रूप में देख रही है।

इस टर्मिनल से खाद्यान्न, उर्वरक, बिटुमेन, पेट्रोलियम उत्पाद, खाद्य तेल, फ्लाई ऐश, कोयला और पत्थर जैसी वस्तुओं के परिवहन की संभावना है।

मानस और संकोश नदियों पर भी चर्चा

ताजा भारत-भूटान वार्ता में केवल ब्रह्मपुत्र ही नहीं, बल्कि मानस और संकोश नदियों की क्षमता पर भी चर्चा हुई है। दोनों देश इस बात की संभावनाएं देख रहे हैं कि इन नदी प्रणालियों को राष्ट्रीय जलमार्ग नेटवर्क से किस प्रकार जोड़ा जा सकता है, ताकि माल परिवहन अधिक सुविधाजनक और लागत प्रभावी बनाया जा सके।

यदि यह योजना आगे बढ़ती है तो भूटान से आने वाला सामान सड़क मार्ग पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय जलमार्ग से भी बड़े बाजारों और बंदरगाहों तक पहुंच सकेगा।

डिब्रूगढ़ में भूटानी युवाओं के प्रशिक्षण की संभावना

द्विपक्षीय बैठक में समुद्री क्षेत्र में कौशल विकास भी चर्चा का हिस्सा रहा। भारत ने डिब्रूगढ़ में विकसित किए जा रहे Centre of Excellence में भूटानी युवाओं को समुद्री और जल परिवहन से संबंधित प्रशिक्षण देने की संभावना पर बातचीत की।

इस पहल का महत्व केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। इससे पूर्वोत्तर भारत में लॉजिस्टिक्स, जहाज संचालन, बंदरगाह प्रबंधन और जल परिवहन से जुड़े नए कौशल और रोजगार के अवसर भी विकसित हो सकते हैं।

असम में नदी व्यापार को हाल में मिला नया विस्तार

ब्रह्मपुत्र को अंतरराष्ट्रीय माल ढुलाई मार्ग के रूप में विकसित करने की दिशा में हाल में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। 5 अक्टूबर 2026 को डिब्रूगढ़ के बोगीबील टर्मिनल से 540 मीट्रिक टन मेथनॉल लेकर एक मालवाहक पोत ढाका के लिए रवाना हुआ। सरकार के अनुसार स्वतंत्रता के बाद ऊपरी असम से किसी विदेशी बंदरगाह के लिए यह पहला ऐसा माल परिवहन था।

यह घटनाक्रम संकेत देता है कि ब्रह्मपुत्र जलमार्ग का उपयोग अब केवल योजना स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय माल परिवहन में इसका वास्तविक उपयोग भी बढ़ रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?

भारत-भूटान जलमार्ग सहयोग पूर्वोत्तर भारत की आर्थिक और सामरिक भूमिका को बदल सकता है।

यदि राष्ट्रीय जलमार्ग-2, जोगीघोपा टर्मिनल और भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल मार्ग का प्रभावी उपयोग बढ़ता है, तो असम क्षेत्रीय व्यापार और लॉजिस्टिक्स का प्रमुख केंद्र बन सकता है।

इससे सड़क परिवहन पर दबाव कम होने, माल ढुलाई की लागत घटने और असम, भूटान तथा बांग्लादेश के बीच व्यापार बढ़ने की संभावना है।

साथ ही यह पहल भारत की Act East Policy और पूर्वोत्तर को दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने की व्यापक रणनीति से भी जुड़ी हुई है।

हालांकि इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि नदी में सालभर नौवहन योग्य गहराई, सीमा शुल्क व्यवस्था, बहु-मोडल संपर्क, कार्गो की नियमित उपलब्धता और भारत-भूटान-बांग्लादेश के बीच प्रक्रियागत समन्वय कितनी प्रभावी तरह से विकसित किया जाता है।

यदि ये चुनौतियां दूर की जाती हैं, तो ब्रह्मपुत्र केवल असम की जीवनरेखा ही नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्र और वैश्विक बाजारों के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापारिक गलियारे के रूप में भी उभर सकता है।

Comments are closed, but trackbacks and pingbacks are open.