भारतीय फैशन उद्योग और बदलती उपभोक्ता मानसिकता

लुई फिलिप, वैन ह्यूसेन, एलन सॉली, पीटर इंग्लैंड, पार्क एवेन्यू, रीड एंड टेलर, मोंटे कार्लो और दा मिलानो जब भारतीय कपड़ों को अपनी पहचान छिपाकर बिकना पड़ा, अब बदल रही है देश की सोच

पूनम शर्मा

आप सोचते होंगे कि लुई फिलिप (Louis Philippe), वैन ह्यूसेन (Van Heusen), एलन सॉली (Allen Solly), पीटर इंग्लैंड (Peter England), पार्क एवेन्यू (Park Avenue), रीड एंड टेलर (Reid & Taylor), मोंटे कार्लो (Monte Carlo) और दा मिलानो (Da Milano) जैसे ब्रांड अमेरिका या ब्रिटेन से भारत आए हैं। भारत के कारखानों में बने कपड़े, भारतीय उद्योगपतियों की कंपनियाँ, भारतीय कारीगरों का हुनर, लेकिन नाम विदेशी! आखिर क्यों दशकों तक भारतीय बाजार में पश्चिमी नाम सफलता की गारंटी माने जाते रहे? अब समय आ गया है कि भारतीय ब्रांड अपनी पहचान पर गर्व करें और उपभोक्ता भी स्वदेशी नामों को प्रतिष्ठा का प्रतीक बनाएँ।

कल्पना कीजिए, एक ही कारखाने में दो बेहतरीन शर्ट तैयार होती हैं। दोनों में एक जैसा कपड़ा, एक जैसी सिलाई और एक जैसी गुणवत्ता है। पहली शर्ट पर लिखा है ‘पीटर इंग्लैंड’ और दूसरी पर ‘गोपाल टेक्सटाइल्स’। पहली शर्ट के लिए ग्राहक दो हजार रुपये देने को तैयार है, लेकिन दूसरी को चार सौ रुपये में खरीदने से पहले भी दस बार सोचेगा।

आखिर क्यों?

क्या कपड़े की गुणवत्ता उसके नाम से तय होती है? क्या अंग्रेजी नाम होने से भारतीय कारीगर के हाथों तैयार शर्ट अधिक प्रतिष्ठित हो जाती है? यह सवाल केवल फैशन का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का है जिसने लंबे समय तक भारतीय बाजार में विदेशी नामों को श्रेष्ठता का पर्याय बना दिया।

विदेशी नाम, भारतीय बाजार और पहचान का भ्रम

लुई फिलिप, एलन सॉली, पीटर इंग्लैंड, वैन ह्यूसेन, पार्क एवेन्यू, रीड एंड टेलर, मोंटे कार्लो और दा मिलानो। इन नामों को सुनकर सामान्य उपभोक्ता के मन में लंदन, पेरिस, न्यूयॉर्क या मिलान की तस्वीर उभर सकती है।

लेकिन इन ब्रांडों की भारतीय बाजार में सफलता की कहानी कहीं अधिक दिलचस्प है। इनमें कई ब्रांड भारतीय कंपनियों ने विकसित किए,  भारतीय कंपनियों ने उनके कारोबार को आगे बढ़ाया। । यह सच है कि पश्चिमी नाम और विदेशी जीवनशैली से जुड़ी छवि भारतीय फैशन बाजार की प्रभावशाली मार्केटिंग रणनीति रही है।

आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय मध्यम वर्ग की क्रयशक्ति बढ़ी। विदेशी फैशन के प्रति आकर्षण भी बढ़ा। अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों की सीमित उपलब्धता और ऊँची कीमतों के बीच पश्चिमी छवि वाले ब्रांडों ने अपनी जगह बनाई। भारतीय उद्योगपतियों ने उपभोक्ता की इसी आकांक्षा को पहचाना।

भारतीय उद्योगपतियों ने विदेशी नामों से खड़ा किया साम्राज्य

आदित्य बिड़ला समूह से जुड़े पीटर इंग्लैंड, लुई फिलिप, एलन सॉली और वैन ह्यूसेन जैसे ब्रांड भारतीय परिधान बाजार में प्रतिष्ठित नाम बन गए।

पीटर इंग्लैंड और एलन सॉली की ऐतिहासिक जड़ें ब्रिटेन से जुड़ी हैं। वैन ह्यूसेन की उत्पत्ति अमेरिका में हुई। लुई फिलिप को भारतीय बाजार में एक प्रीमियम ब्रांड के रूप में विकसित किया गया। एलन सॉली ने ‘फ्राइडे ड्रेसिंग’ की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया और औपचारिक कपड़ों के साथ आरामदायक फैशन का नया चलन स्थापित किया।

इसी तरह रेमंड ने भारतीय सूटिंग उद्योग को नई ऊँचाइयाँ दीं। 1925 में शुरू हुई यह कंपनी भारतीय वस्त्र उद्योग की प्रतिष्ठित पहचान बनी। इसके पार्क एवेन्यू और पार्क्स जैसे ब्रांडों ने अलग-अलग उपभोक्ता वर्गों को आकर्षित किया। रीड एंड टेलर को एस. कुमार्स ने भारतीय बाजार में लोकप्रिय बनाया, जबकि मुंबई का डनियर भी वस्त्र उद्योग का जाना-पहचाना नाम बना।

लुधियाना में ओसवाल समूह से जुड़ा मोंटे कार्लो नाम सुनकर भले ही यूरोप की याद आए, लेकिन इसकी पहचान भारतीय ऊनी वस्त्र उद्योग से बनी।

अहमदाबाद की अरविंद मिल्स से जुड़ी फ्लाइंग मशीन ने भारतीय युवाओं के बीच डेनिम फैशन को लोकप्रिय बनाया। जॉन प्लेयर्स, जॉन मिलर और न्यूपोर्ट जैसे नाम भी भारतीय बाजार की इसी व्यापक ब्रांडिंग संस्कृति का हिस्सा रहे।

आदित्य बिड़ला समूह ने इस रणनीति में महारत हासिल की

1988 में पीटर इंग्लैंड को भारतीय बाजार में पेश किया गया। नाम सुनकर लगता है कि इंग्लैंड में पीटर नाम का कोई व्यक्ति शर्ट बनाता होगा। लेकिन लेख का दावा है कि वास्तविकता में ये शर्ट बेंगलुरु में मदुरा कोट्स द्वारा बनाई जाती थीं, जो बाद में बिड़ला समूह से जुड़ी।

आज पीटर इंग्लैंड भारत के सबसे बड़े पुरुष परिधान ब्रांडों में गिना जाता है। लेख के अनुसार, यह प्रतिवर्ष लगभग तीन करोड़ शर्ट बेचता है, जबकि इंग्लैंड में इसका कोई स्टोर नहीं है।

चमड़े के बैग बनाने वाला दा मिलानो, जूतों का ब्रांड फ्रैंको लियोन और घरेलू उत्पादों का ला ओपाला भी दिखाते हैं कि यूरोपीय ध्वनि वाले नाम केवल कपड़ों तक सीमित नहीं रहे। वहीं अमेरिकी ब्रांड जॉकी के उत्पाद भारत में पेज इंडस्ट्रीज द्वारा लाइसेंस के अंतर्गत बनाए जाते हैं।

इन उदाहरणों में स्वामित्व, उत्पत्ति और लाइसेंस व्यवस्था अलग-अलग हैं, लेकिन एक बात स्पष्ट है—भारतीय बाजार में ब्रांड की छवि ने उत्पाद की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विदेशी नाम से आकर्षण, गुणवत्ता से विश्वास

इन ब्रांडों की सफलता केवल विदेशी नामों का परिणाम नहीं थी। अच्छी गुणवत्ता, आकर्षक पैकेजिंग, आधुनिक शोरूम और सोच-समझकर तय की गई कीमतों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आज ये भारतीय बाजार से जुड़े ब्रांड इतने बड़े हो चुके हैं कि पश्चिम एशिया में भी अपने उत्पाद बेच रहे हैं। भारतीय लुई फिलिप के दुबई में भी स्टोर हैं और वहाँ के कई ग्राहक इसे यूरोपीय ब्रांड समझते हैं।

जब किसी अंतरराष्ट्रीय ब्रांड की शर्ट पाँच हजार रुपये में मिलती थी, तब उससे काफी कम कीमत पर उपलब्ध प्रीमियम दिखने वाली शर्ट भारतीय मध्यम वर्ग को आकर्षित करती थी।

विदेशी मॉडल, अंग्रेजी विज्ञापन, चमकदार शोरूम और यूरोपीय शैली की सजावट ने ब्रांडों को विशिष्ट पहचान दी। लेकिन प्रश्न फिर वही है—क्या भारतीय नाम के साथ यही गुणवत्ता और सफलता संभव नहीं थी?

अब बदल रही है मानसिकता, भारतीय नाम बन रहे गौरव

सुखद परिवर्तन यह है कि नई पीढ़ी अब भारतीय पहचान को लेकर पहले से अधिक आत्मविश्वासी दिखाई दे रही है। मान्यवर, बीबा, ज़ूक, फैबइंडिया और अन्य भारतीय पहचान वाले ब्रांडों ने दिखाया है कि सफलता के लिए अंग्रेजी या यूरोपीय नाम अनिवार्य नहीं है।

मान्यवर ने भारतीय विवाह परंपराओं को आधुनिक ब्रांडिंग से जोड़ा। वहीं फैबइंडिया भारतीय बुनाई, हस्तशिल्प और पारंपरिक वस्त्रों को समकालीन फैशन से जोड़ रहा है। युवा उपभोक्ताओं में आधुनिक भारतीय परिधानों की बढ़ती लोकप्रियता भी इस बदलाव का संकेत है।

आज युवा साड़ी, कुर्ता, इंडो-वेस्टर्न परिधान और भारतीय डिजाइन को नए आत्मविश्वास के साथ अपना रहे हैं। यह परिवर्तन केवल पहनावे में नहीं, सोच में भी दिखाई देता है।

अब भारतीय नामों को विश्वस्तरीय पहचान देने का समय

भारत के पास बनारस का रेशम, कांचीपुरम की साड़ियाँ, असम का मूगा सिल्क, कश्मीर की पश्मीना, गुजरात का पटोला और राजस्थान की बंधेज जैसी अनमोल वस्त्र परंपराएँ हैं। तिरुप्पुर, सूरत, लुधियाना और अहमदाबाद जैसे औद्योगिक केंद्र दुनिया के वस्त्र बाजार में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

फिर भारतीय ब्रांड को अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए विदेशी नाम की आवश्यकता क्यों हो? स्वदेशी का अर्थ विदेशी उत्पादों का विरोध नहीं है। इसका अर्थ है अपनी गुणवत्ता, अपनी रचनात्मकता और अपने नाम पर विश्वास करना।

भारतीय कंपनियों को भी समझना होगा कि स्थायी प्रतिष्ठा केवल नाम से नहीं, बल्कि उत्कृष्ट उत्पाद, विश्वसनीयता और नवाचार से बनती है। अब आवश्यकता है कि भारतीय उद्योगपति अपने ब्रांडों को भारतीय पहचान के साथ वैश्विक बाजार में स्थापित करें और उपभोक्ता विदेशी नाम के बजाय गुणवत्ता को प्राथमिकता दें।

जिस देश के कारीगर दुनिया के प्रसिद्ध फैशन ब्रांडों के लिए वस्त्र तैयार कर सकते हैं, वह देश अपने नाम से विश्वविख्यात ब्रांड क्यों नहीं बना सकता? भारत को अब केवल दुनिया के लिए कपड़े बनाने वाला देश नहीं, बल्कि अपने नाम से दुनिया का फैशन निर्धारित करने वाला देश बनना चाहिए।

क्योंकि असली आत्मनिर्भरता केवल भारत में उत्पादन करने से नहीं आएगी, बल्कि तब आएगी जब भारतीय नाम भी दुनिया में गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और विश्वास का प्रतीक बनेंगे। जिस दिन किसी विदेशी ग्राहक को भारतीय नाम वाला परिधान पहनकर वही गर्व महसूस होगा, जो कभी भारतीय ग्राहक को पश्चिमी नाम पहनकर होता था, उस दिन भारतीय फैशन उद्योग की सफलता का एक नया अध्याय लिखा जाएगा।

यह केवल फैशन उद्योग की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय उपभोक्ताओं की मानसिकता, औपनिवेशिक प्रभाव, ब्रांडिंग की ताकत और बदलते राष्ट्रीय आत्मविश्वास की भी कहानी है।

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