खुदरा महंगाई 5.54 प्रतिशत पहुंची, खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल

भारत में खुदरा महंगाई बढ़कर 5.54 प्रतिशत, खाद्य महंगाई 7.74 प्रतिशत पहुंची; रिजर्व बैंक के सामने नई चुनौती

  • सोमवार को रुपया लगभग एक प्रतिशत मजबूत होकर 95.77 प्रति डॉलर पर बंद।
  • पिछले छह महीनों में सबसे बड़ी एकदिवसीय तेजी दर्ज।
  • RBI ने तेल कंपनियों की डॉलर मांग को नियंत्रित करने के लिए नए उपाय किए।
  • विदेशी निवेश की निकासी और ऊंची तेल कीमतें अब भी चिंता का विषय।

मुंबई, 13 अक्टूबर : भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा बाजार में दबाव कम करने के लिए उठाए गए नए कदमों के बाद सोमवार को भारतीय रुपये में उल्लेखनीय मजबूती दर्ज की गई। डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग एक प्रतिशत मजबूत होकर 95.77 के स्तर पर बंद हुआ।

यह पिछले छह महीनों में रुपये की सबसे बड़ी एकदिवसीय बढ़त रही। इससे पहले शुक्रवार को रुपया 96.73 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था।

डॉलर की मांग कम करने की रणनीति

भारत में विदेशी मुद्रा बाजार पर दबाव बढ़ने का एक प्रमुख कारण आयात के लिए डॉलर की आवश्यकता है।

विशेष रूप से कच्चे तेल का आयात करने वाली कंपनियों को बड़ी मात्रा में अमेरिकी डॉलर की जरूरत होती है।

रिजर्व बैंक ने तेल कंपनियों की डॉलर खरीद को हाजिर विदेशी मुद्रा बाजार से अलग करने और कुछ मुद्रा जोखिम प्रबंधन लेनदेन के नियम कड़े करने जैसे कदम उठाए हैं।

इन उपायों का उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में तत्काल डॉलर मांग कम करना और रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को सीमित करना है।

छह महीने की सबसे बड़ी तेजी

सोमवार को रुपये में लगभग एक प्रतिशत की मजबूती दर्ज की गई।

विदेशी मुद्रा बाजार के लिए यह महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, क्योंकि हाल के महीनों में भारतीय मुद्रा पर अंतरराष्ट्रीय आर्थिक परिस्थितियों का दबाव बना हुआ था।

बाजार विश्लेषकों के अनुसार, रिजर्व बैंक के उपायों के साथ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा डॉलर की बिक्री ने भी रुपये को समर्थन दिया।

विदेशी निवेश और तेल कीमतों का दबाव

रुपये की मजबूती के बावजूद विदेशी मुद्रा बाजार की चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं।

अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेजी, विदेशी निवेशकों द्वारा पूंजी निकासी और वैश्विक वित्तीय अनिश्चितता भारतीय मुद्रा पर दबाव डाल सकती हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2026 में भारत से विदेशी पूंजी निकासी 30 अरब डॉलर से अधिक रही है।

ऐसी परिस्थितियों में विदेशी मुद्रा भंडार और भुगतान संतुलन की स्थिति भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

आम नागरिक और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

रुपये की विनिमय दर में बदलाव का असर केवल वित्तीय बाजार तक सीमित नहीं रहता।

कमजोर रुपया आयातित कच्चे तेल, मशीनरी और अन्य वस्तुओं की लागत बढ़ा सकता है। इसके विपरीत, मुद्रा में स्थिरता आयातकों और उन कंपनियों को राहत दे सकती है जिनका खर्च विदेशी मुद्रा में होता है।

हालांकि, निर्यातकों पर इसका प्रभाव अलग हो सकता है।

आगे की चुनौती

रिजर्व बैंक के नए कदमों से रुपये को तत्काल समर्थन मिला है, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए वैश्विक ऊर्जा कीमतें, पूंजी प्रवाह और भारत की आर्थिक स्थिति महत्वपूर्ण रहेंगी।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि विदेशी निवेश की निकासी और डॉलर की मांग का दबाव बना रहता है, तो मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है ।

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