भारत में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता: एक नए युग की ओर

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली,3 मार्च।
भारत के उपराष्ट्रपति ने ‘इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन: इंडियन पर्सपेक्टिव’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए देश में मध्यस्थता प्रणाली की विश्वसनीयता को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। यह कार्यक्रम इंडिया इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर द्वारा आयोजित किया गया था, जिसमें न्याय, विधि और व्यापार जगत से कई प्रमुख हस्तियों ने भाग लिया।

मध्यस्थता प्रणाली की साख बढ़ाने की आवश्यकता

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय मध्यस्थता प्रणाली को अधिक विश्वसनीय और प्रभावी बनाने के लिए समन्वय आवश्यक है। उन्होंने जस्टिस गुप्ता की प्रशंसा करते हुए कहा कि वह इस चुनौतीपूर्ण कार्य को पूरे समर्पण के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि भारत और यूनाइटेड किंगडम ने 1996 में समान कानून लागू किए थे, लेकिन भारत की मध्यस्थता प्रणाली को कई झटके लगे, जबकि यूके ने इसे सुचारू रूप से लागू किया।

उन्होंने कहा कि विश्व स्तर पर भारत की मध्यस्थता प्रक्रिया अभी भी कमजोर स्थिति में है और हमें केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वास्तविक और ठोस प्रयास करने होंगे। इस प्रणाली में विधानपालिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधि विशेषज्ञों की सहभागिता अत्यंत आवश्यक है।

अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में भारत की भूमिका

उपराष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि भारत को वैश्विक स्तर पर मध्यस्थता के लिए एक प्रमुख केंद्र बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है और अगले कुछ वर्षों में भारत तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है। इस आर्थिक वृद्धि के साथ वाणिज्यिक विवाद भी बढ़ेंगे, जिनका शीघ्र समाधान आवश्यक होगा।

उन्होंने कहा कि भारत की तकनीकी और अधोसंरचना प्रगति अभूतपूर्व है। वैश्विक स्तर पर भारत का डिजिटल लेन-देन सबसे तेज गति से बढ़ रहा है, जिससे व्यवसायों और उद्योगों को अधिक पारदर्शिता और गति मिल रही है।

मध्यस्थता प्रणाली के समक्ष चुनौतियाँ और समाधान

उपराष्ट्रपति ने बताया कि भारत में मध्यस्थता को अक्सर पारंपरिक न्यायिक प्रक्रिया की तरह ही समझा जाता है, जबकि यह उससे कहीं अधिक व्यापक है। उन्होंने इस प्रक्रिया को अधिक उद्योग-केंद्रित और विशेषज्ञता आधारित बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका में पूर्व न्यायाधीशों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ ही समुद्र विज्ञान, उड्डयन, अधोसंरचना और अन्य तकनीकी क्षेत्रों के विशेषज्ञों को भी इस प्रक्रिया में शामिल करना चाहिए।

उन्होंने यूएई, सिंगापुर और लंदन जैसे देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत को भी वैश्विक मध्यस्थता केंद्र के रूप में स्थापित होने के लिए अपने मध्यस्थता संस्थानों की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।

मध्यस्थता से विवाद समाधान नहीं, सहयोग की वृद्धि

अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि मध्यस्थता को वैकल्पिक विवाद समाधान के बजाय पहली पसंद बनाया जाना चाहिए। उन्होंने विवाद समाधान प्रक्रिया को मतभेद समाधान और फिर सहमति समाधान में बदलने की बात कही। उन्होंने कहा कि यदि हम मध्यस्थता को एक सहयोगी प्रक्रिया के रूप में देखते हैं, तो यह न केवल व्यापार और उद्योग को गति प्रदान करेगी, बल्कि भारत को एक वैश्विक मध्यस्थता हब के रूप में स्थापित करेगी।

निष्कर्ष

भारत अब केवल संभावनाओं वाला देश नहीं रहा, बल्कि यह विकसित राष्ट्र बनने के मार्ग पर अग्रसर है। यदि भारत को वास्तव में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता प्रणाली में अपनी साख बनानी है, तो इसे सशक्त, विश्वसनीय और उद्योग-हितैषी बनाना होगा। उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत को अब इस दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे ताकि यह वैश्विक मध्यस्थता मानचित्र पर मजबूती से अपनी पहचान बना सके।

उन्होंने जस्टिस गुप्ता और उनकी टीम को इस महत्वपूर्ण पहल के लिए शुभकामनाएँ दीं और कहा कि वह इस उद्देश्य में पूर्ण समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

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