समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 7 नवंबर : भारत-चीन सीमा पर हाल के घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चुनौती केवल सैनिकों की संख्या या हथियारों की ताकत तक सीमित नहीं रही। अब निगरानी, ड्रोन, भूमिगत ढांचा, त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता, संचार और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
हाल में सेवानिवृत्त हुए भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर की एक सार्वजनिक टिप्पणी इसी कारण चर्चा के केंद्र में आई। कपूर ने चीन सीमा को आईटीबीपी के लिए “सबसे कठिन” मोर्चा बताया और चीन को भारत का “सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी” कहा। उन्होंने यह भी कहा कि पारंपरिक तरीकों से चीन की सैन्य क्षमता का मुकाबला करना कठिन होगा और भारत को ड्रोन तथा ड्रोन-रोधी प्रणालियों को बड़े स्तर पर अपनाना होगा।
अरुणाचल में आमने-सामने की स्थिति ने बढ़ाई चिंता
कपूर ने कहा था कि अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों पर भारतीय और चीनी बलों के बीच आमने-सामने की स्थिति बनी और कुछ स्थानों पर यह जारी भी रही। उन्होंने आईटीबीपी की नई “शौर्य” कमांडो इकाइयों की भूमिका की प्रशंसा की। बाद में विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत-चीन सीमा पर कभी-कभी तब तनाव पैदा होता है जब चीनी बल स्थापित गश्ती व्यवस्थाओं से अलग व्यवहार करते हैं और दोनों पक्ष ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए मौजूदा सैन्य एवं राजनयिक तंत्र का इस्तेमाल करते हैं।
यहां एक बात समझना जरूरी है। भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पूरी तरह परिभाषित और संयुक्त रूप से चिह्नित नहीं है। दोनों देशों की कई क्षेत्रों में एलएसी को लेकर अलग-अलग धारणाएं हैं। इसी वजह से गश्त के दौरान आमने-सामने की स्थितियां पहले भी बनती रही हैं। सरकार ने संसद में कई बार यही स्थिति स्पष्ट की है।
2014 के बाद क्या बदला?
कुछ राजनीतिक विश्लेषणों में यह दावा किया जा रहा है कि 2014 के बाद भारत ने सीमा गश्त की नीति मूल रूप से बदल दी। इस दावे को सावधानी से समझने की जरूरत है।
सरकारी दस्तावेज बताते हैं कि नियमित गश्त और एलएसी की भारतीय धारणा तक पहुंचने की नीति 2014 से पहले भी मौजूद थी। 2012 और 2013 में भी रक्षा मंत्रालय ने कहा था कि भारतीय और चीनी बल अपनी-अपनी एलएसी की धारणा तक गश्त करते थे।
हालांकि 2014 के बाद सीमा बुनियादी ढांचे, सड़क, सुरंग, निगरानी और सैन्य तैयारियों को बढ़ाने पर अधिक जोर दिखाई दिया। सितंबर 2014 में चुमार क्षेत्र में चीनी सैनिक भारतीय धारणा वाली एलएसी के पार आए थे और बाद में फ्लैग बैठक के बाद लौटे।
2017 का डोकलाम गतिरोध इस बदलती रणनीतिक दृढ़ता का बड़ा उदाहरण बना। चीन द्वारा सड़क निर्माण का प्रयास किए जाने के बाद भारतीय सैनिकों ने भूटान के साथ समन्वय में उस गतिविधि का विरोध किया। विदेश मंत्रालय ने तब कहा था कि सड़क निर्माण से यथास्थिति में महत्वपूर्ण बदलाव आता और भारत की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता था।
लेकिन इसे केवल किसी एक वर्ष में शुरू हुई नई “गश्त नीति” कहना ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा। अधिक सही निष्कर्ष यह है कि पिछले दशक में भारत की सीमा अवसंरचना, निगरानी और सक्रिय प्रतिक्रिया क्षमता में लगातार विस्तार हुआ है।
ड्रोन अब सीमा सुरक्षा का नया केंद्र
आईटीबीपी की सबसे महत्वपूर्ण तैयारी ड्रोन क्षमता का विस्तार है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार प्रत्येक सीमा-रक्षक बटालियन में ड्रोन प्लाटून बनाई जा रही है। उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में विशेष कमांडो इकाइयां और भूमिगत सुरक्षा ढांचा भी विकसित किया जा रहा है।
कपूर का तर्क था कि ड्रोन तकनीक युद्ध के समीकरण को बदल रही है। छोटे और अपेक्षाकृत कम संसाधन वाले देश भी उन्नत ड्रोन क्षमता के जरिए बड़ी सैन्य शक्ति को चुनौती दे सकते हैं।
सरकार भी सीमा क्षेत्रों में मानव रहित हवाई यानों, ड्रोन, उपग्रह निगरानी, सेंसर और भू-निगरानी रडार के इस्तेमाल को बढ़ा रही है। गृह मंत्रालय ने मार्च 2026 में संसद को बताया कि संवेदनशील सीमा क्षेत्रों में ड्रोन और उपग्रह आधारित निगरानी सहित कई तकनीकी प्रणालियां तैनात की जा रही हैं।
चीन से सबसे बड़ी सीख क्या?
चीन ने पिछले कई दशकों में सीमा तक सड़क, रेल, सैन्य ठिकानों और संचार नेटवर्क का विशाल ढांचा विकसित किया है। साथ ही उसकी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और अत्याधुनिक निगरानी प्रणालियों में भारी निवेश किया है।
भारत के लिए इसका उत्तर केवल समान संख्या में सैनिक तैनात करना नहीं हो सकता।
तेज सड़क संपर्क, सुरंगें, हर मौसम में खुली आपूर्ति व्यवस्था, वास्तविक समय की खुफिया जानकारी, ड्रोन-रोधी क्षमता और त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया भविष्य की सीमा सुरक्षा के मुख्य आधार होंगे।
2020 के बाद भारत और चीन के बीच कई दौर की सैन्य और राजनयिक बातचीत के बाद देपसांग और डेमचोक सहित घर्षण वाले क्षेत्रों में गश्ती व्यवस्था पर अक्टूबर 2024 में समझौता हुआ। भारत सरकार के अनुसार इसके बाद इन क्षेत्रों में पुराने अभ्यास के अनुसार गश्त दोबारा शुरू हुई।
राजनीतिक बहस भी तथ्य आधारित हो
इस पूरे मामले में राजनीति भी तेज हुई। कुछ टिप्पणियों में कहा गया कि विपक्ष ने आईटीबीपी प्रमुख की चेतावनी को नजरअंदाज किया, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टें इसका समर्थन नहीं करतीं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य कांग्रेस नेताओं ने कपूर के बयान के बाद सरकार से अरुणाचल की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की थी।
इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषय को पक्ष और विपक्ष के आरोपों से आगे ले जाना आवश्यक है।
भारत के लिए वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि किस राजनीतिक दल ने किस बयान का क्या अर्थ निकाला। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारत तकनीकी, अवसंरचनात्मक और सामरिक स्तर पर चीन के साथ लंबे समय तक चलने वाली सीमा प्रतिस्पर्धा के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है?
शत्रुजीत कपूर की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण संदेश भी यही है—भविष्य की सीमा सुरक्षा केवल बहादुर सैनिकों से नहीं, बल्कि बहादुर सैनिक, बेहतर तकनीक, मजबूत ढांचा और स्पष्ट रणनीति—इन चारों के संयोजन से तय होगी।
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