समग्र समाचार सेवा
पटना, बिहार, 19 अक्टूबर: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों के बीच जेडीयू की हाल ही में जारी उम्मीदवार सूची सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी हुई है। पार्टी ने इस बार सिर्फ चार मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जिसके बाद सोशल मीडिया पर मजाक और व्यंग्य का दौर शुरू हो गया है।
सोशल मीडिया यूजर्स ने इसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नई पॉलिसी से जोड़कर भी तंज कसा है। एक यूजर ने लिखा, “मौलवी नीतीश ने सही किया, इस्लाम में चार निकाह से ज्यादा की इजाजत नहीं।” इस पोस्ट ने तेजी से वायरल होकर राजनीतिक मंच और सोशल मीडिया दोनों जगह ध्यान आकर्षित किया।
‘इस्लाम में 4 से ज़्यादा की इजाज़त नहीं’
हर धर्म की अपनी रीति-रिवाज और मान्यताएं होती हैं। इस्लाम में विवाह संबंधी नियमों के अनुसार चार से अधिक शादी की अनुमति नहीं है। इसी बात को लेकर सोशल मीडिया पर जेडीयू की सूची का मजाक बन गया है। फेसबुक पर ‘मंजर इमाम’ नाम के यूजर ने पोस्ट साझा करते हुए लिखा, “भाइयो और प्यारी माओ बहनो, परेशान न हों, इस्लाम में चार से ज्यादा की इजाजत नहीं है, मौलवी साहब ने बिल्कुल ठीक किया है।”
इन सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे
जेडीयू ने इस बार मुस्लिम वोटरों को ध्यान में रखते हुए चार उम्मीदवार घोषित किए हैं:
- अररिया: श्रीमती शगुफ्ता अजीम
- जोकीहाट: मंजर आलम
- चैनपुर: मोहम्मद जमाल खान
- अमौर: साबिर अली
बिहार में मुस्लिम आबादी करीब 17 प्रतिशत के आसपास है, यानी लगभग दो करोड़ से ज्यादा वोटर। यह वोट बैंक राज्य की राजनीति में हमेशा अहम भूमिका निभाता रहा है। कई ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं जहां मुस्लिम मतदाता जीत-हार का फैसला कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जेडीयू की यह रणनीति मुस्लिम वोटों को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई हो सकती है, लेकिन सोशल मीडिया पर इसका मजाक बनना पार्टी के लिए सामाजिक और राजनीतिक चुनौती भी बन सकता है।
इस बीच विपक्षी दल और राजनीतिक विश्लेषक भी इस मुद्दे पर टिप्पणी कर रहे हैं। उनका कहना है कि जेडीयू को अपने संदेश और उम्मीदवार सूची को स्पष्ट रूप से जनता के सामने रखना होगा, ताकि भ्रष्ट राजनीतिक धारणाओं और सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले मजाकों से प्रभाव कम किया जा सके।
जेडीयू की यह रणनीति, राज्य के मुस्लिम वोटरों के दृष्टिकोण और चुनावी परिणाम पर महत्वपूर्ण असर डाल सकती है। आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी के मुस्लिम उम्मीदवारों की भूमिका निर्णायक साबित हो सकती है, खासकर उन सीटों पर जहां मुस्लिम वोट बैंक अधिक प्रभावशाली है।
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