पत्रकार अभिसार शर्मा को सुप्रीम कोर्ट से राहत: गिरफ्तारी पर चार हफ्ते की रोक, असम हाईकोर्ट जाने के निर्देश

 समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 28 अगस्त: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को वरिष्ठ पत्रकार अभिसार शर्मा को बड़ी राहत देते हुए उनकी गिरफ्तारी पर चार हफ्तों के लिए अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने उन्हें असम हाईकोर्ट का रुख करने का निर्देश दिया, जहां उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को चुनौती दी जा सकती है।

जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस कोटेश्वर सिंह की पीठ ने कहा, “हम आपको सुरक्षा देंगे, लेकिन आप हाईकोर्ट को क्यों बाईपास कर रहे हैं? हम एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं। हम चार सप्ताह की अंतरिम सुरक्षा देते हैं ताकि आप हाईकोर्ट जा सकें।”

असम में दर्ज हुआ केस

शर्मा पर असम में एक निजी व्यक्ति की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई थी। उन्होंने अपने वीडियो में राज्य सरकार के उस फैसले पर सवाल उठाया था जिसमें 3,000 बीघा आदिवासी जमीन को एक प्राइवेट कंपनी को सीमेंट फैक्ट्री के लिए देने की बात थी। यह वीडियो गुवाहाटी हाईकोर्ट की कार्यवाही पर आधारित था। शर्मा ने असम सरकार पर विभाजनकारी राजनीति करने और अहम जनहित मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगाया था।

संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला

अभिसार शर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और विवेक तन्खा ने अदालत में दलीलें पेश कीं। सिब्बल ने कहा कि शर्मा ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 को भी चुनौती दी है, जो पुराने राजद्रोह कानून (आईपीसी की धारा 124-ए) का नया रूप है। उन्होंने कहा, “यह धारा बेहद व्यापक है और पत्रकारों के खिलाफ इस्तेमाल की जा रही है। इसी तरह के मामलों पर पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई लंबित है।”

अदालत ने शर्मा की याचिका को उन मामलों के साथ जोड़ने पर सहमति दी, जिनमें धारा 152 को चुनौती दी गई है। इन याचिकाओं में पूर्व सैन्य अधिकारी एसजी वोमबटकेरे और स्वतंत्र पत्रकारिता संस्था फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिज़्म (The Wire) द्वारा दायर याचिकाएँ शामिल हैं।

पत्रकारिता की आज़ादी पर चोट का आरोप

शर्मा ने अपनी याचिका में कहा कि यह मामला धारा 152 का दुरुपयोग है, जिससे असहमति की आवाज़ को दबाने और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर हमला किया जा रहा है। उन्होंने लिखा, “एक पत्रकारिता आधारित वीडियो पर आजीवन कारावास तक की सजा वाली धारा लगाना लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान का अपमान है।”

शर्मा पिछले तीन दशकों से पत्रकारिता कर रहे हैं और उनके यूट्यूब चैनल के 90 लाख से अधिक सब्सक्राइबर हैं। उन्होंने कहा कि किसी मुख्यमंत्री की नीतियों और राजनीति की आलोचना को देश की एकता और संप्रभुता पर हमला नहीं माना जा सकता। “अगर हर आलोचनात्मक आवाज़ को ‘राष्ट्रविरोधी’ कहा जाएगा तो संविधान द्वारा प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता केवल दिखावा बन जाएगी।”

“राम राज्य” विवाद और आरोप

एफआईआर में आरोप लगाया गया कि शर्मा ने अपने वीडियो में “राम राज्य” का ज़िक्र कर धार्मिक भावनाओं को आहत किया। हालांकि, शर्मा ने अपनी याचिका में कहा कि उनके बयान का उद्देश्य धर्म या आस्था को ठेस पहुँचाना नहीं था, बल्कि सत्ता में बैठे लोगों द्वारा ‘राम राज्य’ के राजनीतिक उपयोग की आलोचना करना था।

उन्होंने दावा किया कि उन्होंने केवल असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के उन भाषणों का हवाला दिया था जिनमें सांप्रदायिक बयानबाज़ी दर्ज है। “यह मेरे गढ़े हुए आरोप नहीं थे, बल्कि सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध राजनीतिक भाषणों का संदर्भ था,” शर्मा ने कहा।

 

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