महरौली दरगाह-चिल्लागाह विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, नहीं होगा कोई नया निर्माण

समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 19 अगस्त: दिल्ली के महरौली इलाके में स्थित आशिक़ अल्लाह दरगाह और सूफी संत बाबा शेख फ़रीदुद्दीन की चिल्लागाह को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण आदेश दिया। अदालत ने साफ कर दिया कि इन धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों पर अब किसी भी तरह का नया निर्माण, बदलाव या तोड़फोड़ नहीं होगी।

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने की। अदालत ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) दोनों से विस्तृत जवाब मांगा है।

अदालत ने पूछा- आखिर क्यों तोड़ना चाहते हैं?

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने डीडीए से सख्त लहजे में सवाल किया – “आप इसे क्यों तोड़ना चाहते हैं?” इस पर डीडीए की ओर से जवाब आया कि यह पूरा इलाका वन क्षेत्र के दायरे में आता है और दरगाह के पास कुछ अतिरिक्त निर्माण हुए हैं, जिन पर उन्हें आपत्ति है।

एएसआई ने माना 12वीं सदी का स्मारक

वहीं, याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट निज़ाम पाशा ने दलील दी कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस दरगाह को 12वीं सदी का स्मारक माना है। उनका कहना था कि यह ऐतिहासिक धरोहर है और किसी धार्मिक समिति की राय की यहां कोई प्रासंगिकता नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि यहां कोई अनधिकृत निर्माण नहीं है।

डीडीए की ओर से तर्क दिया गया कि वे केवल उसी हिस्से को सुरक्षित रखेंगे, जिसे एएसआई संरक्षण के लिए कहेगा।

पहले दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा था मामला

यह विवाद एक जनहित याचिका से शुरू हुआ था, जिसमें मांग की गई थी कि दरगाह और चिल्लागाह को तोड़े जाने से रोका जाए। हालांकि दिल्ली हाई कोर्ट ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि ये संरचनाएं एएसआई के अधीन संरक्षित स्मारक नहीं हैं।

इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

सुप्रीम कोर्ट ने दी अंतरिम राहत

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल स्पष्ट किया है कि दरगाह और चिल्लागाह की मौजूदा स्थिति में कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। न तो कोई नया निर्माण होगा और न ही किसी तरह की तोड़फोड़ की जाएगी।

इस आदेश से साफ है कि अभी महरौली की इन ऐतिहासिक और धार्मिक संरचनाओं को किसी भी खतरे से बचा लिया गया है।

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश न केवल दिल्ली की ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाले स्थलों के संरक्षण में जल्दबाज़ी या प्रशासनिक दबाव से निर्णय नहीं लिए जा सकते। अब आगे इस मामले में एएसआई और डीडीए की रिपोर्ट के आधार पर ही अंतिम फैसला होगा।

 

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