समग्र समाचार सेवा
नई दिल्ली, 8 अगस्त: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस महीने के आखिर में होने वाली चीन यात्रा को लेकर राजनीतिक हलकों और रणनीतिक विश्लेषकों के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। मामला सिर्फ एक राजनयिक दौरे का नहीं, बल्कि उन सवालों का है जो गलवान घाटी की झड़प और पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत-चीन रिश्तों की संवेदनशीलता से जुड़े हैं।
31 अगस्त और 1 सितंबर को चीन के उत्तरी शहर तियानजिन में होने वाले शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी के हिस्सा लेने की संभावना है। इस दौरान उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी हो सकती है।
गलवान के बाद पहली चीन यात्रा
2020 में गलवान घाटी में हुई भीषण झड़प के बाद से पीएम मोदी चीन नहीं गए थे। इससे पहले उनकी आखिरी चीन यात्रा 2018 में हुई थी। सवाल उठ रहा है कि जब गलवान की घटना के बाद प्रधानमंत्री ने पांच साल तक चीन से दूरी बनाए रखी, तो अब पहलगाम आतंकी हमले के तुरंत बाद यह यात्रा क्यों?
राजनीतिक और रणनीतिक आपत्तियां
कई विश्लेषक मानते हैं कि यह कदम ऐसे समय पर उठाया जा रहा है जब चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते तनावपूर्ण हैं। आलोचकों का कहना है कि ऐसे पड़ोसी देशों पर भरोसा करना इतिहास और भूगोल के सबक को नजरअंदाज करना है।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की यह बात आज भी प्रासंगिक है—“हम इतिहास बदल सकते हैं, लेकिन भूगोल नहीं।”
रूस की भूमिका और अमेरिका-चीन समीकरण
हाल के महीनों में रूस ने भारत-चीन के बीच पुल का काम करने की कोशिश की है। बीते वर्ष रूस में मोदी-जिनपिंग मुलाकात के बाद द्विपक्षीय रिश्तों में कुछ नरमी आई थी। लेकिन इसके साथ ही अमेरिका-चीन के बढ़ते प्रभाव और बांग्लादेश में हुए राजनीतिक घटनाक्रम ने भारत की विदेश नीति पर दबाव बढ़ा दिया।
चीन से बढ़ती नजदीकी के संकेत
बीते महीने विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चीन यात्रा के दौरान शी चिनफिंग से मुलाकात की थी। इससे पहले अजीत डोभाल और राजनाथ सिंह भी चीन दौरे पर गए थे।
भारत ने पांच साल बाद चीन के लिए टूरिस्ट वीजा बहाल किया और कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तारीखें तय कीं। अब सीधी उड़ानों की बहाली पर भी चर्चा चल रही है।
कूटनीति में सख्त संदेश की जरूरत
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अमेरिका, रूस और चीन के साथ बातचीत में साफ करना होगा कि आसेतु हिमालय के पड़ोसी देशों या एशियाई क्षेत्र में कोई भी भारत विरोधी कदम बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। भारत न केवल गुटनिरपेक्ष है, बल्कि ग्लोबल साउथ का भी अगुवा है।
अगर चीन इस बात पर सहमत है, तो रिश्ते सुधारे जा सकते हैं, अन्यथा सीमा खींच देनी चाहिए।
पीएम मोदी की यह यात्रा एक रणनीतिक दांव भी हो सकती है और राजनीतिक जोखिम भी। सवाल यह है कि गलवान से लेकर पहलगाम तक की घटनाओं का दर्द भूले बिना क्या भारत-चीन रिश्तों में नया अध्याय शुरू हो सकता है?
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